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नक्सली मोर्चे पर आत्मघाती हताशा

जगदलपुर. बस्तर में नक्सली मोर्चे पर तैनात सुरक्षा बलों में बढ़ती हताशा की तस्वीर चिंताजनक है। पिछले 10 दिनों में एक गोपनीय सैनिक और दो सीआरपीएफ जवानों ने आत्महत्या कर ली।

छोटेडोंगर में तैनात सीआरपीएफ के जवान वी श्रीकुमारन नायर ने मंगलवार सुबह अपनी इंसास राइफल से खुद को गोली मार ली। वह ओणम पर अपने घर जाना चाह रहा था, लेकिन उसकी छुट्टी मंजूर नहीं हो पाई।

लंबे समय तक दूर-दराज के इलाकों में सेवा दे रहे जवान मानसिक बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। पुलिस महकमे में लंबे अरसे तक सेवा दे चुके लोग ही दबी जुबान से कहते हैं कि विसंगतिपूर्ण तबादला नीति और समय पर छुट्टी न मिलना भी असंतोष की खास वजह है।

यह भी गौरतलब है कि आत्महत्या की ज्यादातर घटनाएं त्योहारों के वक्त हुई हैं। जवानों ने छुट्टी न मिलने या फिर छुट्टी से वापस लौटने पर खुदकशी की है। पिछले साल 31 जनवरी को कोंडागांव में सीआरपीएफ के ही जवान लखविंदर सिंह ने एसएलआर से आत्महत्या की थी। वह कुछ ही दिनों पहले छुट्टी से लौटा था।

तनाव से दूर रखने उपाय हो रहे
जवान की आत्महत्या के मामले में सीआरपीएफ का कोई अधिकारी अधिकारिक तौर पर प्रतिक्रिया देने को तैयार नहीं है, लेकिन नारायणपुर एसपी अजय यादव ने बताया कि जवानों को तनाव से दूर रखने हर तरह के उपाय किए जा रहे हैं। इन्हें दिमागी तौर पर तरोताजा रखने रोस्टर के आधार पर छुट्टियां दी जा रही हैं। इसके साथ ही इनके मनोरंजन का भी पूरा ख्याल रखा जाता है। नक्सल प्रभावित इलाके में जवानों को परिवार रखने की सुविधा कम ही जगहों पर है। हाल ही में ६५ पुलिस क्वार्टर की बस्तर में स्वीकृति मिली है।

जवानों में अधिक हताशा
आत्महत्या के मामलों में जवानों की तादाद काफी अधिक है। अफसर भी तनाव में होते हैं, लेकिन वे मिलने वाली तमाम तरह की सुविधाओं के चलते काफी हद तक राहत पा लेते हैं। 1988 में दंतेवाड़ा के तत्कालीन एसपी आलोक टंडन ने अपनी सर्विस रिवाल्वर से आत्महत्या कर ली थी।

नक्सल विरोधी मुहिम में जुटे पुलिस के जवानों की मुश्किलें अन्य स्थानों पर तैनाती की बनिस्बत कहीं अधिक होती है। यहां उन्हें अपने घर परिवार से दूर रहकर जान जोखिम में डाल दुर्गम पहाड़ियों, नदी-नालों और जंगलों की खाक छाननी पड़ती है। बुनियादी सुविधाओं की कमी, कठोर और उबाऊ दिनचर्या तिस पर मनोरंजन के अभाव की वजह से पुलिसवालों में असंतोष और क्षोभ की भावना बलवती होती है। कभी-कभी यह कुंठा भयावह रूप लेती है।

मनोचिकित्सक डा. सुनीत उपाध्याय बताते हैं कि नक्सल विरोधी मुहिम में तैनात जवान हर वक्त नक्सली हमले के खतरे, बारूदी धमाकों और हिंसात्मक वारदातों में अपने साथियों को खोने की वजह से ‘रिएक्शन टू स्ट्रेस’ के शिकार हो जाते हैं। ऐसे मरीजों का दिमाग केंद्रित नहीं रहता। अचानक तनाव और सदमे से यह बीमारी हो सकती है। पीजी कालेज में समाजशास्त्र के सहायक प्राध्यापक प्रदीप गौराहा के मुताबिक इन परिस्थिति से उबरने में आला अफसरों का संबल काफी कारगर हो सकता है।

आत्महत्या का सिलसिला

क्र. ---- स्थान --------- दिनांक ----------------- जवान का नाम
1. --- कोंडागांव -------- 31 जनवरी 07 -------- लखविंदर सिंह (सीआरपीएफ)
2. ---- कोंटा ---------- 1 फरवरी 07 --------- गीर्सीटेन (नगा आम्र्ड पुलिस)
3. ---- बेदरे ---------- 9 फरवरी 07 ---------- मोहंदा कारिया (गोपनीय सैनिक)
4. ---- कांकेरलंका ------ 9 अगस्त 08 ---------- जीवायए जीनस (सीआरपीएफ)
5. ---- पामलवाया ------ 13 अगस्त 08 --------- जितेंद्र एंड्रिक (गोपनीय सैनिक)
6. ---- छोटेडोंगर ------- 19 अगस्त 08 --------- वी श्रीकुमारन नायर (सीआरपीएफ)





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