Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
मल्लिका शेरावत ‘मान गए मुगले आजम’ में रंगधर्मी परेश रावल की पत्नी बनी हैं। छोटे शहर में मियां-बीबी नाटक करते हैं। इस नाट्य मंडली को नष्ट होने से बचाने के लिए उन्हें एक सफल नाटक करना है और वे ‘अनारकली’ मंचित करते हैं। ‘
पहल’ के ताजे अंक में नए कथाकार मनीष द्विवेदी की कहानी प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने फिल्म ‘मुगले आजम’ के अंतिम दृश्य के बाद कहानी को आगे बढ़ाया है कि किस तरह अकबर के आदेश से अनारकली, उसकी मां और चंचल बहन सुरैया को लाहौर के बाहरी इलाके में बसाया गया और जिसे उन पर निगाह रखने का काम दिया था, उसने सुरैया से प्रेम विवाह किया।
अनारकली संज्ञाशून्य हो चुकी थी और ताउम्र वैसी ही रही-गूंगी एवं बहरी। सलीम बेहोशी की उस दवा के असर से बाहर आए तो अनारकली को विस्मृत कर चुके थे। उन्होंने बेतहाशा शिकार किया और शराबनोशी में अपने को डुबोए रखा। उनके हरम में लगभग 300 औरतें आ गईं।
मनीष द्विवेदी ने सलीम और युवा बेवा मेहरुन्निसा के प्रेम प्रकरण का विवरण दिया है। लगभग 15 वर्ष बाद सलीम अपने पुराने महल में अनारकली की पेंिटंग देखते हैं और उन्हें सब याद आ जाता है। वे लाहौर जाते हैं और असमय बुढ़ा गई अपनी विक्षिप्त अनारकली को देखते हैं।
उसे कुछ भी याद नहीं। सुरैया उन्हें बताती है कि उसकी गैरहाजिरी में किसी चोर ने अनारकली के साथ संभोग किया और उसे बेटा हुआ है जिसके चेहरे पर वही चमक और सौंदर्य है जिसके लिए अनारकली प्रसिद्ध थी। लाहौर से लौटकर सलीम, मेहरुन्निसा से निकाह कर लेते हैं।
ज्ञातव्य है कि शेक्सपियर के रोमियो-जूलियट लिखने के पहले इसी प्रेमकथा पर एक नाटक लिखा गया था जिसके अंतिम भाग में युवा-युवतियों की कब्रों के नीचे तहखाना था। दरअसल युद्ध रोकने के लिए प्रेमियों की मौत का नाटक रचा गया था और कब्र के नीचे के तहखाने से उन्हें जीवित निकालकर विदेश भेज दिया गया था। शेक्सपियर ने अंत को खारिज किया और सच्ची त्रासद प्रेमकथा लिखी।
उनका यह भी ख्याल था कि प्रेमी प्राय: कहते हैं कि तेरे बिना एक पल नहीं जी सकता। अत: शेक्सपियर की प्रेम कथा चार दिन में ही समाप्त हो जाती है ताकि मिलने, बिछुड़ने इत्यादि में भावों की तीव्रता बनी रही। तमाम महान प्रेम कहानियां त्रासदी हैं और उनके आगे की कथा की कल्पना की जा सकती है। मसलन अगर भागती हुई पारो के चेहरे पर दरवाजा बंद नहीं होता तो वह मृतप्राय: देवदास के गले लग जाती और वह शायद ठीक हो जाता, तब पारो के जमींदार पति क्या करते?
यह भी संभव है कि देवदास के पिता अपना अहंकार छोड़ देते तो युवा देवा और पारो की शादी हो जाती। देवदास और पारो का स्वभाव ऐसा था कि विवाहित जीवन में उनका रोज ही झगड़ा होता।
दुनिया भर की प्रसिद्ध प्रेम कहानियों ने शादी को निरस्त किया है जबकि शादी के बाद भी प्रेमकथा जीवित रहती है। तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली से बेहद प्यार करते थे और सांप को रस्सी समझकर उसके सहारे रत्नावली के कक्ष में पहुंच गए थे जो कुछ रोज के लिए मायके आई हुई थीं। इसी जगह रत्नावली की लताड़ से वे रामकथा लिखने की ओर प्रवृत्त हुए। ‘पहल’ में ‘अनामिका’ ने रत्ना का दर्द इस तरह प्रस्तुत किया है-
‘सदियों तक मैंने किया इंतजार
आएगा कोई तोड़ेगा टांके गूदड़ के
ले जाएगा मुझको आके..
नैहर बस घर नहीं होता, होता है नैहर
अंगड़ाई, एक निश्चिंत उबासी,
एक नन्हीं सी फुर्सत..’