News
International International लंदन.एक खुफिया रिपोर्ट ने उस पुरानी धारणा को खारिज कर दिया है, जो आतंकी बनने के पीछे एक खास कारण को दर्शाती थी। ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एमआई 5 द्वारा तैयार इस ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि त्वचा के रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता के आधार पर आतंकी की रूपरेखा बनाना संभव नहीं है। एजेंसी का यह भी मानना है कि आतंकवाद की ओर जाने का कोई एक रास्ता नहीं है।
एजेंसी ने इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए उन सैकड़ों लोगों के मामलों का अध्ययन किया, जो ब्रिटेन में धन संग्रह करने और आत्मघाती हमलों जैसी आतंकी गतिविधियों से जुड़े थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकतर आतंकी ब्रिटेन के ही नागरिक थे। इनमें से करीब आधे ब्रिटेन में जन्में थे और कुछ दूसरे देशों से आकर यहां बसे थे। विभिन्न नस्लों के ये लोग पाकिस्तानी, दक्षिण एशियाई और श्वेत पृष्ठभूमि के थे।
संगठनों को मिला हथियार
एजेंसी का मानना है कि त्वचा के रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता को आधार बनाकर किसी पर शक नहीं किया जा सकता है। यह रिपोर्ट उन मानवाधिकार संगठनों के लिए एक हथियार की तरह काम करेगी, जिनकी यह शिकायत है कि पुलिस अधिकतर एशियाई मूल के ब्रिटिश लोगों को आतंकी मानकर इनके खिलाफ ‘रोको और तलाशी लो’ कानूनों का इस्तेमाल करती है।
धार्मिक कट्टरता नहीं देती बढ़ावा
एजेंसी ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि धार्मिक कट्टरता आतंकवाद को बढ़ावा देती है। उसका मानना है कि आतंकवाद में शामिल कई लोग नियमित रूप से अपने ईश्वर की पूजा नहीं करते हैं। इनमें धार्मिक ज्ञान की कमी होती है और इन्हें नौसिखिया कहा जा सकता है।
कुछ ही अपने घर के कड़े धार्मिक माहौल में बड़े होते हैं। कई नए कट्टरवादी तो ऐसे होते हैं, जो नशीले पदार्थ व शराब के सेवन के साथ सेक्स वर्कर्स के पास जाते रहे हैं। एजेंसी के अनुसार पूरा धार्मिक ज्ञान व्यक्ति को हिंसक होने से रोकता है।