२३ अगस्त 1970, जी हां इसी दिन इंदौर की प्यास नर्मदा जल से बुझाने की घोषणा मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने राजबाड़ा की आमसभा में की थी। वह घोषणा उस आंदोलन की परिणिति थी जो तमाम राजनीतिक मतभेदों और दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर चला और तीन महीने में ही लक्ष्य पा लिया।
नर्मदा आंदोलन की पृष्ठभूमि में 1966 में पड़ा भयंकर सूखा था। तब महसूस किया गया यशवंतसागर, बिलावली, स्थानीय कुएं व बावड़ी से इतर कोई बड़ा ोत इस बढ़ते शहर की प्यास बुझाने के लिए चाहिए। ख्याल आया नर्मदा का लेकिन उसे लाना इतना आसान नहीं था। फिर भी बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं में जल समस्या के स्थायी निदान पर चर्चा चल पड़ी थी। धीरे-धीरे सभी दलों में समान विश्वास पात्र मुकुंद कुलकर्णी इसके केंद्र में आ गए।
14 जून 1970 को राजबाड़ा के गणोश हॉल में छात्र नेताओं और युवाओं की बैठक हुई जिसमें श्री कुलकर्णी के साथ राकेश शर्मा, ललित जैन, चंद्रप्रभाष शेखर, महेंद्र महाजन, महेश जोशी, सुभाष कर्णिक, शशिकांत शुक्ल, प्रकाश खराटे, उपेंद्र शुक्ला, ओमप्रकाश साबू, कैलाश खंडेलवाल और शलभ शर्मा मौजूद थे। इस समिति को कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, जनसंघ और समाजवादियों का समर्थन हासिल था।
5 जुलाई 1970 को समिति ने पहला मैदानी आंदोलन किया। वह था नर्मदा के समर्थन में शहरभर में 50 हजार बैज लगाना और 15 हजार हस्ताक्षर कराना। 15 से 20 जुलाई के बीच शहर की लगभग सारी सामाजिक संस्थाएं आंदोलन से जुड़ गईं। केंद्रीय मंत्री प्रकाशचंद्र सेठी ने भी आंदोलन का समर्थन कर दिया।
उसके बाद समिति ने 8 अगस्त 1970 को इंदौर बंद का नारा दिया। इसके समर्थन में नुक्कड़ सभाएं आयोजित की गई। कलेक्टर श्री कृष्णन और एसपी श्री नटराजन ने बंद के दौरान शांति बनाए रखने के लिए सभी दलों व संगठनों की बैठक भी बुलाई। उन्हें भी साफ कह दिया गया शहर इतना आंदोलित हो चुका है कि इसे संभालना प्रशासन का ही काम है। तब तक सांड आश्रम (मल्हारगंज में श्री शर्मा का मकान) आंदोलन की गतिविधियों का केंद्र बन गया था।
बंद के दिन सुबह 25 टेम्पो में युवकों की टोलियां शहर में अपील करने निकली। बंद इतना सफल रहा कि कारोबार के साथ रेल-बस यातायात भी प्रभावित हुआ। अंतत: प्रशासन को लिखना ही पड़ा इंदौर के नागरिक नर्मदा योजना के बगैर चुप नहीं रह सकते। इसके बाद 23 अगस्त को श्री शुक्ल इंदौर आए और आमसभा में नर्मदा योजना की घोषणा की।
उधर, मालवा मिल निवासी अनोखीलाल पहलवान ने नर्मदा को इंदौर लाने के लिए 35 दिन लगातार खड़े रहने का प्रण किया। उनका व्रत भी श्री शुक्ल ने घोषणा के बाद तुड़वाया। उनके बाद श्री सेठी मुख्यमंत्री बने और उन्होंने नर्मदा योजना के लिए पैसा स्वीकृत किया, चंद्रप्रभाष शेखर को मंत्री बनाया और 1972 में काम की शुरुआत करवाई।
छह साल में नर्मदा जलूद से इंदौर तक 76 किलोमीटर का सफर तय कर पहुंच गई प्यास बुझाने। तब आबादी थी सात लाख। उसके बाद शहर का विस्तार इतनी तेजी से हुआ कि इसे महानगर कहा जाने लगा। उसके बाद मांग बढ़ी तो 11.50 लाख आबादी के लिए दूसरा चण लाया गया, जो 1990 में पूरा हुआ। 2007 से तीसरे चरण का काम चल रहा है जो 35 लाख की आबादी के लिए है।
..और भी मुद्दे हैं आंदोलन के लिए- नर्मदा की ही तरह इंदौर-खंडवा ब्रॉडगेज, इंदौर से पीथमपुर नई लाइन और इंदौर से रतलाम मीटर गेज को ब्रॉडगेज में तब्दील करने के लिए भी आंदोलन की जरूरत है। नर्मदा के लिए किया गया आंदोलन गवाह है कि निहित स्वार्थो को छोड़ शहर, प्रदेश व देश के विकास के लिए आंदोलन किया जाए तो सफतला मिलेगी और इंदौर का नाम सूरज की तरह चमकेगा।