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लेक्चरर बना टैक्सी चालक

जींद. डॉलर की चमक के आगे सफेदपोश नौकरी की हैसियत भी कई बार फीकी पड़ जाती है। कुछ ऐसा ही एसडी सीनियर सैकंडरी स्कूल में कॉमर्स के लेक्चरर रहे सुरेंद्र चहल के साथ भी हुआ।

वे ऑस्ट्रेलिया गए तो थे अकाउंटेंट बनने बनने, परंतु जब उन्हें पता चला कि टैक्सी चालक को अकाउंटेंट से ज्यादा पैसा मिलता है। उन्होंने तुरंत इरादा बदला और पैसा कमाने के लिए टैक्सी चलाने की ठानी। वे आजकल टैक्सी कौंसिल के सदस्य भी हैं। सुरेंद्र टैक्सी चलाकर प्रति माह दो लाख रुपए कमा रहे हैं।

एडिलेड से फोन पर सुरेंद्र ने बताया कि वहां अकाउंटेंट की कमाई हर महीने करीब एक लाख रुपए तक है। वहां पहुंचने के कुछ दिन बाद जब वे टैक्सी मालिक ईरानी नागरिक हमीद के संपर्क में आए तब उन्हें पता चला कि वहां अकाउंटेट से ज्यादा टैक्सी चालक कमाता है। सुरेंद्र का कहना था कि हमीद ने उन्हें टैक्सी चलाने के लिए प्रेरित किया था। अब वे हफ्ते में 6 दिन टैक्सी चलाते हैं।

टैक्सी चलाने के लिए प्लेट जरूरी
टैक्सी चलाने के लिए ऑस्ट्रेलिया सरकार सिर्फ 9 सौ प्लेट जारी करती है। जिन चालकों के पास ये प्लेट होती हैं, वे ही टैक्सी चला सकते हैं। एक प्लेट की कीमत 3 से साढ़े 3 लाख रुपए होती है। टैक्सी उपलब्ध कराने के लिए सब अर्बन, इंडीपेंडेंट व येलो कंपनियों को अधिकार मिले हैं।

कई भारतीय छात्र टैक्सी चालक
ऑस्ट्रेलिया में पढ़ रहे कई भारतीय बच्चे अपना खर्च निकालने के लिए टैक्सी चलाते हैं। चहल ने बताया कि यहां छात्र सप्ताह में 20 घंटे से ज्यादा टैक्सी नहीं चला सकते। दोषी पाए जाने पर सजा और जुर्माना भी हो सकता है।

कमाई ज्यादा, डिग्री का नहीं फायदा
चंडीगढ़: कनाडा में पंजाबी नौजवानों को ट्रांस्पोर्ट का धंधा ज्यादा लुभाता है। पंजाब से इंजीनियरिंग, डॉक्टरी करके जाने वाले युवक कनाडा जाकर ट्रकिंग सेक्टर में तकदीर आजमाते हैं। कनाडा से अमेरिका के चार-पांच दिन के एक फेर में दो-तीन हजार डॉलर की बचत होती है जबकि अन्य नौकरियों में महीने बाद तीन-चार हजार डॉलर मिलते हैं।

कनाडा या ऑस्ट्रेलिया में सामान्यता काम के प्रति घंटा 8 से 10 डॉलर मिलते हैं। दिन में 8-10 घंटे काम करने के बाद 80 से 100 डॉलर तक कमाई होती है। कनाडा में मेडिकल सेक्टर में नर्सेज या अन्य मेडिकल स्टॉफ को 25 से 35 डॉलर प्रति घंटा मिलते हैं वे अधिकतम छह घंटे ही काम करते हैं। सप्ताह में पांच दिन काम करने के बाद वे 3-4 हजार डॉलर ही कमा पाते हैं। जबकि होटलिंग, टैक्सी या ट्रक चलाने में उन्हें इससे दुगनी आमदनी हो जाती हैं।

टोरंटो में ट्रक चालक जसविंदर ढल्ल का कहना है कि उनकी इंजीनियरिंग की डिग्री को कनाडा में मान्यता नहीं मिली। ऐसे में न चाहते हुए भी टैक्सी चलानी पड़ी। अब टैक्सी से होने वाली कमाई के आगे इंजीनियर की नौकरी फीकी दिखती है। आसानी से मिलने वाले लोन और अधिक कमाई के चलते पंजाबी नौजवान ट्रकिंग सेक्टर की ओर जा रहे हैं।

पटियाला के रोशन सिंह पंजाब में डॉक्टर थे लेकिन कनाडा इमिग्रेशन के बाद उन्होंने मेडिकल सेक्टर में नौकरी या प्रेक्टिस की कोशिश की लेकिन इसके लिए उन्हें पहले कनाडियन मेडिकल टेस्ट पास करने पड़ने थे। परिवार सहित कनाडा पहुंचे रोशन सिंह ऐसा चाह कर भी नहीं कर सके। परिवार चलाने के लिए पहले काम करना जरूरी था, इसलिए टैक्सी चालक की नौकरी की अब वे इसी धंधे में रम गए हैं।





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