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बीएसएनएल के गले की फांस बनी डायरेक्ट्री

बिलासपुर. बीएसएनएल के लिए टेलीफोन डायरेक्टरी गले की फांस साबित हो रही है। विभाग को दूरसंचार जिले (बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर) के लिए करीब 50 हजार डायरेक्टरी की जरूरत है, लेकिन सप्लाई करने वाली कंपनी द्वारा अब तक केवल 9 हजार डायरेक्टरी ही उपलब्ध कराई गई है। कंपनी का कहना है कि विभाग पहले भुगतान करे, फिर डायरेक्टरी उपलब्ध कराएंगे, वहीं विभाग पहले डायरेक्टरी देने के बाद भुगतान करने की जिद पकड़े बैठा है।

भारत संचार निगम की टेलीफोन डायरेक्टरी बीरबल की खिचड़ी से कम नहीं है। लंबे समय से नहीं छापी गई डायरेक्टरी इस वर्ष छापी तो गई, लेकिन अंतत: उपभोक्ताओं तक अपनी पहुंच नहीं बना सकी। नियमानुसार हर तीन साल में टेलीफोन डायरेक्टरी छापी जानी चाहिए, लेकिन विभाग व छापने वाली कंपनी के बीच सामंजस्य स्थापित नहीं होने के कारण इसे छापने में सात वर्ष लग गए।

विभाग द्वारा अपने नए ग्राहकों को पुराने ग्राहकों से परिचित कराने एवं पुराने ग्राहकों को नए का नंबर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से टेलीफोन डायरेक्टरी उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन फिलहाल इससे दोनों ही वंचित हैं। विभाग द्वारा पिछली बार वर्ष 2000-01 में टेलीफोन डायरेक्टरी छापी गई थी, तब शहर में उपभोक्ताओं की संख्या 55 हजार थी। आज की स्थिति में मोबाइल एवं निजी दूरसंचार कंपनियों के चलते बीएसएनएल के स्थायी टेलीफोन कनेक्शनों में भारी गिरावट आई है।

वर्तमान में शहर में बीएसएनएल के करीब 25 हजार उपभोक्ता ही रह गए हैं। डायरेक्टरी के अभाव में विभाग द्वारा उपभोक्ताओं को टेलीफोन नंबर बताने के लिए मुफ्त पूछताछ 197 की सेवा दी जा रही थी, लेकिन इसे भी रायपुर स्थानांतरित कर दिया गया है। दोनों सुविधाओं के अनुपलब्ध होने के बाद उपभोक्ताओं को नए नंबरों को जानने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है।

कंपनी ने विभाग की जरूरत के हिसाब से काफी कम डायरेक्टरी उपलब्ध कराई है। ऐसी स्थिति में इसका वितरण नहीं किया जा सकता। डायरेक्टरी नहीं पाने वाले उपभोक्ताओं में असंतोष पैदा होगा। इधर कंपनी पूरी सप्लाई किए बिना ही भुगतान चाह रही है, जो संभव नहीं है। कंपनी पहले पूरी सप्लाई करे, फिर भुगतान किया जाएगा।
—केके सिंह, जीएम, बीएसएनएल





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