जयपुर. जयपुर सहित प्रदेश के प्रमुख शहरों के सुनियोजित विकास के लिए डेढ़ साल पहले लागू की गई नई टाउनशिप पॉलिसी आखिरकार सरकार को स्थगित करनी ही पड़ गई।
स्वायत्त शासन एवं नगरीय विकास विभाग ने ही अपनी पॉलिसी में कई तरह की खामियां मानते हुए इसमें संशोधन की जरूरत बताई है। जेडीए, स्थानीय निकायों और हाउसिंग बोर्ड को निर्देश दिए हैं कि वह पुरानी टाउनशिप पॉलिसी के तहत ही टाउनशिप योजनाओं को मंजूरी दें।
बीते दिनों जयपुर में जमीनों के आसमान छूते भावों और बड़ी संख्या में आ रही टाउनशिप योजनाओं की वजह से राज्य सरकार ने 29 मार्च, 2007 को नई टाउनशिप पॉलिसी लागू की थी।
इस पॉलिसी में टाउनशिप योजना के लिए न्यूनतम 40 बीघा (10 हैक्टेयर) भूमि की अनिवार्यता लगा दी थी। इसके अलावा निजी विकासकर्ता का स्थानीय निकायों में पंजीयन अनिवार्य करने के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्गो के लिए भी आवासीय योजना में भूखंड निर्धारित करने की शर्त रखी थी। निजी विकासकर्ता के लिए 10 करोड़ रुपए के वार्षिक टर्नओवर की अनिवार्यता भी लागू कर दी थी।
दांव पर थी छोटे किसानों की जमीन
निजी टाउनशिप में विकास कार्यो की सुनिश्चितता बनाए रखने के लिए योजना की 12.5 प्रतिशत जमीन स्थानीय निकाय द्वारा अपने पास रखने का प्रावधान किया गया था। लेकिन इस नीति में छोटे किसानों की जमीनें जबरन बिकवाने का रास्ता खोल दिया गया था। यानी बड़ी योजनाओं के बीच में आने वाली जमीन को यदि कोई किसान बेचना नहीं चाहता था तो उसे अवाप्त कर डवलपर्स को दिया जा सकता था।
पॉलिसी की राह में ये थी अड़चनें
>> प्राइवेट डवलपर्स आवासीय योजनाएं नहीं ला रहे थे।
>> कई छोटे डवलपर्स की आवासीय योजनाएं अटक गई थीं।
>> छोटे डवलपर्स के लिए 40 बीघा जमीन जुटाना भारी।
>> जयपुर सहित बड़े शहरों का विकास रुक गया था।
>> डवलपर्स पॉलिसी स्थगित करने का दवाब बना रहे थे।
>> डेढ़ साल में एक भी योजना नहीं आने से जेडीए ने सरकार को स्थगित करने का पिछले माह प्रस्ताव भी भेजा था।
यह होगा असर
>> छोटे प्रॉपर्टी डीलर्स और डवलपर्स की आवासीय योजनाओं को मंजूरी मिल सकेगी। प्रॉपर्टी का बाजार बिलकुल ठप पड़ा है। छोटे डवलपर्स काम कर सकेंगे।
>> निजी विकासकर्ता का पंजीयन नहीं होने से खरीदारों को धांधलियों का शिकार होना पड़ सकता है।
>> उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत कम कीमत पर भूखंड मिल सकेंगे, लेकिन जेडीए की योजनाओं पर असर पड़ेगा।