नई दिल्ली.
एक तरफ जहां परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की 4-5 सितंबर की बैठक में पेश होने वाले नए मसौदे का अमेरिका की ओर से इंतजार हो रहा है, वहीं मनमोहन सिंह सरकार में यह संदेह गहराने लगा है कि बुश प्रशासन में एनएसजी से भारत को परमाणु व्यापार की अनुमति दिलाने का सामर्थ्य है भी या नहीं।
45 सदस्यीय एनएसजी की 21-22 अगस्त को विएना में हुई बैठक में जिस तरह से भारत का जोरदार विरोध हुआ, उसने सरकारी हलकों को झकझोर दिया है। भारत को प्रतीकात्मक विरोध की उम्मीद थी। मगर छह देश विरोध में उतर आए और दो अन्य देशों ने भी उनका समर्थन किया। लगभग एक दर्जन देशों ने भी खामोश आपत्तियां दर्ज करई।
इस असफलता के कारण सरकार में निराशा है कि अमेरिका ने भारत को एनएसजी से बिना शर्त अनुमति दिलाने के अपने वादे को नहीं निभाया। साथ ही यह आशंका भी पैदा हो गई है कि अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर बुश प्रशासन का प्रभाव कम हो रहा है और शायद वह नवंबर के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए अमेरिकी कांग्रेस को स्थगित किए जाने से पहले 123-समझौते को पारित कराने में भी कामयाब नहीं हो पाएगा।
अगस्त की एनएसजी बैठक से पहले स्थिति का सही आकलन न कर पाई सरकार अब सितंबर की बैठक के लिए सावधानी बरत रही है। सूत्रों का कहना है कि पिछली बैठक से एक दिन पहले तक भारतीय अधिकारी आश्वस्त थे कि केवल आयरलैंड और आस्ट्रिया के विरोध का सामना करना पड़ेगा। सरकार का आकलन था कि 43 देशों के समर्थन के आगे ये दो देश भी झुक जाएंगे।
50 संशोधनों का प्रस्ताव : 21 अगस्त को जब बैठक शुरू हुई तो न्यूजीलैंड, नार्वे और स्विटजरलैंड ने भी आयरलैंड व आस्ट्रिया का हाथ थाम लिया। बैठक में जब बातचीत आगे बढ़ी तो फिनलैंड और स्विटजरलैंड के अलावा कुछ और सदस्य देश भी विरोध में उतर आए और उन्होंने मसौदे में संशोधन का प्रस्ताव रखा। न्यूजीलैंड के विदेश मंत्रालय की ओर से इस हफ्ते मंगलवार को जारी एक बयान के मुताबिक, कम से कम 50 संशोधनों का प्रस्ताव दिया गया था।
तो हटना पड़ेगा करार से : यह स्पष्ट है कि सभी 50 संशोधनों को नए मसौदे में शामिल नहीं किया जाएगा, लेकिन यदि कुछ को भी शामिल किया जाता है तो भारत के लिए इन बदलावों को स्वीकार करना संभव नहीं होगा। सरकार में शामिल एक उच्चस्तरीय सूत्र ने कहा कि यदि बदलाव हल्के-फुल्के नहीं हुए तो भारत के पास भारत-अमेरिकी परमाणु करार से हटने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा।