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मुस्लिम महिलाएं तलाक के खिलाफ

नई दिल्ली. अपने धर्म के प्रति पूरी आस्था रखने के बावजूद मुस्लिम महिलाओं ने समाज के कुछ पक्षपाती प्रावधानों का खुलेआम विरोध किया है।

आल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमन एसोसिएशन (एडवा) द्वारा यहां आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर से आईं हजार से अधिक महिलाओं ने तीन तलाक और हलाला व्यवस्था के प्रति असंतोष जाहिर किया। ये महिलाएं एकतरफा तलाक की व्यवस्था को बदलना चाहती हैं, ताकि वैवाहिक जीवन को समाप्त करने का अधिकार उनके हाथ में भी आ सके।

नेताओं से मदद की अधिक उम्मीद न होने के कारण अनेक मुस्लिम महिलाएं न्याय पाने के लिए कानून का रास्ता भी अपना रही हैं। वे अपने मामलों का फैसला मौलवियों और धार्मिक नेताओं के हाथों में देने की बजाय कोर्ट की शरण ले रही हैं।

इन्होंने पेश किए उदाहरण
>> उड़ीसा में भद्रक जिले के एक गांव की निवासी नजमा बीवी (28) को उसके पति ने नशे में तीन बार तलाक कह दिया था। गांव की पंचायत ने आदेश दिया कि नजमा को अपने पति के साथ दोबारा रहने के लिए हलाला (दूसरे व्यक्ति से शादी व तलाक) करना पड़ेगा।

दंपती ने इसे मानने से इनकार कर दिया, जिसकी वजह से नजमा का पति गांव में बेरोजगार हो गया और परिवार को भी समुदाय से दरकिनार कर दिया गया। नजमा ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली, जहां उसके पक्ष में फैसला आया कि उसकी शादी वैध है। पिछले पांच साल से अपने पति के साथ खुशी-खुशी जिंदगी बिता रही है।

>> उत्तरप्रदेश की रजिया खातून को उसके पति ने फोन पर ही तलाक दे दिया। यह निर्णय सिर्फ पति का था, जिसके लिए न कोई चर्चा हुई, न बैठक और न ही कोई वाद-विवाद। समुदाय के सदस्यों व नेताओं ने भी पति का पक्ष लिया। कोई विकल्प न होने के कारण रजिया ने इस फैसले को मान लिया, मगर उसने इस तरह की व्यवस्था का विरोध करने का अपना एक अलग तरीका अपनाया। अब वह बुर्का नहीं पहनती है और अपने गांव में बिना मुंह ढके ही निकलती है।

‘भारत में मुस्लिम की जिंदगी पक्षपातपूर्ण रवैये व समस्याओं से भरी है। फिर महिला होना तो एक अतिरिक्त समस्या है। मुस्लिम महिलाओं के उद्धार का जिम्मा सिर्फ मुस्लिम समुदाय पर ही नहीं छोड़ना चाहिए। हम चाहते हैं कि इस दिशा में भारत सरकार भी अपनी जिम्मेदारी निभाए।’
- वृंदा करात, माकपा नेता व महिला अधिकार कार्यकर्ता





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