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कब अलग होगा छत्तीसगढ़

भोपाल. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को अलग हुए लगभग आठ साल हो चुके हैं, लेकिन सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा अभी तक प्रदेश का नया नक्शा (छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद) जारी नहीं किया जा सका है।

लगभग सात साल तो भोपाल स्थित क्षेत्रीय कार्यालय को जिलों से जानकारी जुटाने, सैटेलाइट इमेज से मैपिंग करने और उसके बाद सरकारी विभागों से पुष्टि करने में ही लग गए। उसके बाद 2007 में यहां से डिजिटल नक्शे की सीडी सर्वे ऑफ इंडिया के मुख्यालय देहरादून भेजी गई। सर्वे ऑफ इंडिया के मुख्यालय ने अनुमति के लिए इसे दिल्ली स्थित आर्मी के जीएसजीएस मुख्यालय भेजा। वहां से अभी तक अनुमति नहीं मिलने के कारण इसकी छपाई नहीं हो पा रही है।

किसी भी प्रदेश या देश की सीमा की अंतिम रूप से पुष्टि आर्मी द्वारा ही की जाती है। सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा तैयार कोई भी मैप पहले देहरादून जाता है। वहां स्क्रूटनी के बाद इसे दिल्ली कार्यालय भेजा जाता है।

आर्मी द्वारा बॉर्डर लाइन की पुष्टि के बाद ही इसे छापा जाता है। हर साल जुड़ते-घटते नए जिलों, नई सीमाओं, तहसीलों को भी सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से अपडेट किया जाता है। प्रदेश के भीतर सीमाएं बदलने पर नक्शा अपडेट करने के लिए आर्मी की अनुमति की जरूरत नहीं होती है, इसलिए ये जल्दी छप जाते हैं। हालांकि इसमें भी पांच से दस साल का समय लगता है। प्रदेश का नक्शा अंतिम बार 2005-06 में अपडेट हुआ था। अब पांच-दस साल बाद अपडेट होगा।

नक्शा बेचना अवैध है: विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित नक्शा बाजारों में भले ही धड़ल्ले से बिकता हो लेकिन हर नक्शे पर सर्वे ऑफ इंडिया का कॉपीराइट होता है। अनाधिकृत नक्शों को बाजार में बेचना तो अवैध है ही, सर्वे ऑफ इंडिया के मैप काउंटर से खरीदे गए नक्शे की फोटोकॉपी करवाना भी अवैध है। इसकी शिकायत होने पर सजा हो सकती है।

बाजार में मिलने वाले नक्शे अधिकृत नहीं: डिजिटल सेक्शन इंचार्ज संतोष अग्रवाल के मुताबिक बाजार में जो नक्शा उपलब्ध है, वह पूरी तरह सही नहीं है। उसे सुविधा के अनुरूप वैकल्पिक तौर पर बना लिया गया है।

स्कूल और अन्य लोग इसे इस्तेमाल जरूर कर रहे हैं लेकिन यह अधिकृत नहीं है। इन नक्शों का सबसे ज्यादा उपयोग आर्मी और वन विभाग में होता है। अधिकारियों के मुताबिक हर महीने लगभग 50 हजार रुपए कीमत के पुराने नक्शे बिक रहे हैं। जहां तक बात आर्मी और वन विभाग की है तो इन विभागों को सीडी उपलब्ध करवा दी गई है, ताकि इनके काम में एक्यूरेसी बनी रहे।

..तो बंद हो जाएगा सर्वे ऑफ इंडिया: हर क्षेत्र को नक्शे पर उसकी सटीक जगह दिखाने वाले सर्वे ऑफ इंडिया के ही जगह के ठिकाने नहीं है। यदि प्रदेश सरकार ने सुध नहीं ली तो यह कार्यालय हमेशा के लिए यहां से स्थानांतरित हो जाएगा।

1980 में सर्वे ऑफ इंडिया की भोपाल युनिट की स्थापना हुई थी। तब से यह विभाग किराए के भवन में चल रहा है। उस समय 125 कर्मचारी थे, अब मात्र 24 रह गए हैं। तकनीक बदलने और सैटेलाइट इमेज से चित्र खींचे जाने के कारण नए कर्मचारियों की भर्ती भी बंद कर दी गई है। कौशल कहते हैं कि यदि हमें जगह नहीं दी गई तो इस कार्यालय को जबलपुर निदेशालय में मर्ज कर दिया जाएगा।

बहुत सा सरकारी काम करते हैं: डिजिटल सेक्शन इन्चार्ज संतोष अग्रवाल कहते हैं, सर्वे ऑफ इंडिया का कार्यालय यदि भोपाल से चला जाता है तो सरकार को भी नुकसान होगा क्योंकि हम प्रदेश सरकार का बहुत सा काम करते हैं। अभी जब इंदिरा सागर बांध की ऊंचाई और डूब क्षेत्र को लेकर विवाद हुआ तो हमने ही ताबड़तोड़ सर्वे कर सरकार को दिया। इसी तरह अन्य कई मामले हैं।





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