भोपाल.
जो अच्छा गाता है वही गुणी कहलाता है, क्योंकि म्यूजिक एक प्रेक्टिकल चीज है। मैं मानता हूं मेरा गला सुरीला नहीं है, लेकिन इसके बाद भी मैंने मौसिकी से मोहब्बत की है। यह कहना है दार्शनिक, अंतरराष्ट्रीय वकील, संगीतविद्, आडियो इंजीनियर और इकोनोमिस्ट रजा काजिम का।
वे गुरुवार को ध्रुपद संस्थान एवं भारत भवन के सहयोग से संवाद श्रंखला के अंतर्गत आयोजित व्याख्यान में बोल रहे थे। ‘संगीत और दर्शन’ विषय पर आयोजित अपने व्याख्यान में सरहद पार लाहौर से आए रजा काजिम ने कहा कि वे भोपाल पहली बार आए हैं और यहां बिताया जा रहा एक-एक पल मुझे शहर के और करीब लाता जा रहा है।
उन्होंने बताया कि जब वे भारत से पाकिस्तान जा रहे थे, तब उनके पास कुछ गानों के रिकार्ड, शेरो शायरी की किताबें और दो जोड़ी कपड़े थे। यानी कुल मिलाकर करीब 18 किलो सामान ही मेरी पूंजी थी। तब उन्हें संगीत सुनने का शौक तो था, लेकिन उसकी बहुत ज्यादा जानकारी नहीं। ऐसे में जब उन्होंने देखा कि उनके बच्चों का रुझान पॉप म्यूजिक की ओर जा रहा है, तब उन्होंने मौसिकी को समझने का फैसला किया।
इस क्षेत्र में लंबा समय देने के बाद वे कोई गायक तो नहीं बन सके, लेकिन 40 साल के लंबे परिश्रम के बाद सागर वीणा जैसा वाद्य बनाने में जरूर सफल रहा।वे कहते हैं कि जिसमें रस नहीं वह संगीत नहीं और संगीत में रस के साथ भाव भी जरूरी है।
बिना रस और भाव के गायकी असरकारक नहीं होती।रजा साहब फरमाते हैं कि कई लोग क्लासिकल म्यूजिक का अर्थ निकालते हैं पुराने संगीत से। जो जितना ज्यादा पुराना वह क्लासिक। लेकिन मै मानता हूं।
क्लासिक याने सुपर क्वालिटी और जब कोई चीज सुपर क्वालिटी की होती है तो उसका अलग ही इंपेक्ट पड़ता है। वह सीधे दिल को छूती है। व्याख्यान के बाद रजा काजिम की बेटी एवं मोहम्मद शरीफ पुंछ वाले की शिष्या नूर जेहरा काजिम ने सागर वीणा पर राग देस में अलाप और जोड़ की मनमोहक प्रस्तुति देकर दर्शकों का मनमोह लिया।