News
Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर.
भारत ने मेजर ध्यानचंद के नेतृत्व में लगातार चार ओलिंपिक में स्वर्ण जीते। अमेरिका को 23-1 के विशाल अन्तर से मात दी, परन्तु हमारा देश इस वर्ष खेलों के महाकुंभ में क्वालिफाई भी नहीं कर पाया।
हाकी प्लेयर्स का मानना है कि एस्ट्रो टर्फ आने के बाद भारतीय खिलाड़ी तकनीक में खरे नहीं उतर पा रहे हैं। सुविधाओं पर ध्यान दिया जाए तो फिर हाकी का स्वर्णिम युग लौटाया जा सकता है।
टर्फ पर फेल हुए खिलाड़ी
मध्यभारत प्रांत से नेशनल खेल चुके महेश अग्रवाल का कहना है कि हाकी में नए रूल्स व एस्ट्रोटर्फ के पदार्पण होने के बाद से ही भारत हाकी में पिछड़ता चला गया। वह बताते हैं कि इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1977 में जब हॉलैंड की टीम भारत दौरे पर आई थी तब ग्वालियर में न्यूट्रल ग्रास पर अभ्यास मैच में मध्यभारत की टीम ने हॉलैंड को चार गोलों से मात दी परन्तु भोपाल में टर्फ पर खेले गए मैच में हॉलैंड की टीम हावी रही और भारतीय टीम को हार झेलनी पड़ी।
सुविधाओं का है अभाव
एनआईसी हाकी कोच अविनाश भटनागर का कहना है कि हाकी के लिए संसाधनों की कमी है। स्थानीय स्तर पर ही देखा जाए तो वर्षो पुराने संगठन मध्यभारत हाकी संघ पर अपना खुद का मैदान नहीं है। रेलवे हाकी स्टेडियम पर अखिल भारतीय स्तर पर सिंधिया गोल्ड कप हाकी प्रतियोगिता आयोजित की जाती है परन्तु स्थानीय खिलाड़ियों को प्रतिनिधित्व कम ही मिल पाता है। हाकी के क्षेत्र में बेहतर प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए हाकी संघ को आर्थिक रूप से मजबूत किया जाना चाहिए।
टर्फ मैदानों की कमी
हाकी खिलाड़ी राजेन्द्र शर्मा का कहना है कि यूरोपीय देशों ने भारत के बाद हाकी सीखी परन्तु वे मूलभूत सुविधाओं में आगे निकल गए। टर्फ पर खेलने के लिए जितनी शारीरिक व मानसिक टफनेस खिलाड़ियों में आवश्यक है उतनी अब नहीं रहती। इसका एक कारण देश में टर्फ मैदानों की कमी है।
स्कूली स्तर से खत्म हुई हाकी
भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हसरत कुरैशी का कहना है कि स्कूली स्तर से हाकी का समाप्त होना इस खेल में भारतीय टीम के प्रदर्शन में गिरावट का कारण है। इंडियन हाकी फेडरेशन ने जब से प्रीमियर हाकी लीग शुरू की। जूनियर लेवल से खिलाड़ियों को निखारने वाली नेशनल प्रतियोगिताएं खत्म कर दी र्गई जिससे पूरी चेन टूट गई।
स्मृति शेष
3 दिसम्बर 1979 को हाकी के जादूगर ध्यानचंद ने भले ही अंतिम सांस ली परन्तु हाकी के क्षेत्र में उनकी स्मृतियां हमेशा अमिट रहेंगी। 29 अगस्त को उनके जन्मदिन पर हाकी खिलाड़ियों ने उन्हें कुछ इस तरह याद किया।
-हाकी में हिट, डबलिंग पर वर्षो तक जो मेहनत मेजर ध्यानचंद ने की उसने विदेशी धरती पर अद्भुत खेल का नजारा पेश किया।
- हसरत कुरैशी
ध्यानचंद के जादुई खेल का ही परिणाम था कि हिटलर ने खुद उनकी हाकी चेक की। हिटलर का ऑफर ठुकराकर उन्होंने देश का मान बढ़ाया।
- महेश अग्रवाल
ध्यानचंद के स्टिक वर्क का कोई शानी नहीं था। व्यक्तिगत रूप से उन्होंने अपने खेल पर जो मेहनत की उसमे कोच तक की मेहनत की आवश्यकता नहीं थी।
- राजेन्द्र शर्मा