दृष्टिकोण.
हाल के हफ्तों में परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह(एनएसजी) में भारत-अमेरिका परमाणु करार को लेकर विरोध देखा जा रहा है। इसके अलावा अमेरिका में भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि भारत पर प्रतिबंध लगे रहने चाहिए।
असल में अमेरिका के एड मार्की और एलन तौशर जैसे कुछ नीति-निर्माता इस बात को लेकर परेशान रहे कि एनएसजी भारत को राहत दे सकता है। वे अब कह रहे हैं कि एनएसजी महत्वपूर्ण होते हुए भी अधिक चर्चा में न रहने वाला संगठन है। उनका तर्क विरोधाभासी है। यदि एनएसजी ऐसा ही एक संगठन है तो उसके रुख को लेकर इतना परेशान क्यों हुआ जाए?
हो सकता है कि इस करार का विरोध करने वाले मार्की जैसे लोग और न्यूजीलैंड व ऑस्ट्रिया जैसे देश उस आदर्श सोच को लेकर चल रहे हों जिसके मूल में हमारे इस ग्रह को परमाणु की भयावहता से सुरक्षित बनाने की बात है, लेकिन उनकी नीति पूरी तरह से ठीक नहीं है। ऐसे सिर्फ दो ही तरीके हैं जिनके जरिए मानव सभ्यता परमाणु से पैदा होने वाले खतरों से खुद को बचा सकती है।
सभी देशों के लिए इसका एकमात्र और ज्यादा तर्कसंगत हल होगा अपनी नाभिकीय सामग्री को तज देना। यह ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है कि वैश्विक समुदाय ने इस मसले पर मुंह-जुबानी खर्च कहीं अधिक किया और बगैर किसी गंभीर उद्देश्य के कूटनीतिक खेल खेलने के अलावा व्यावहारिक रूप से और कुछ नहीं किया। दूसरा विकल्प सुरक्षा मानकों का एक वैश्विक तंत्र के रूप में निहित है, जो शांति के लिए परमाणु के इस्तेमाल के संदर्भ में प्राचीन सोच की बजाय 21वीं सदी की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करे।
जवाहरलाल नेहरू विश्व के संभवत: ऐसे पहले नेता थे जिन्होंने परमाणु निरस्त्रीकरण की बात की और यथार्थ के धरातल पर इसे आगे बढ़ाया। इसी परिपाटी पर पिछली आधी सदी से सभी भारतीय सरकारें चलती आ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र से लेकर गुट-निरपेक्ष आंदोलन समेत सभी वैश्विक बहुपक्षीय मंच पर भारत ने दुनिया के देशों को इस बात के लिए मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वे परमाणु शक्ति की विकरालता और लत से छुटकारा पाएं।
लेकिन तकरीबन आधी शताब्दी पहले और बीसवीं सदी के अंत तक किसने भारत की बात सुनी? भारत निरस्त्रीकरण की रट लगाए जा रहा था जबकि बड़े-बड़े ताकतवर देश अपने-अपने पावर गेम्स खेलने में व्यस्त थे। अब अचानक कुछ और शक्तियां उभर आई हैं और वे हैं गैर-राष्ट्रीय शक्तियां। सोचिए अगर ये व्यापक जनसंहार के हथियार कुछ अड़ियल राष्ट्रों द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के जरिए या फिर अवैध तरीके से इन गैर-राष्ट्रीय ताकतों के हाथों में पहुंच गए तो कितनी तबाही मच सकती है। यही भय दुनिया के इतिहास के किसी भी समय से ज्यादा अब निरस्त्रीकरण को और ज्यादा जरूरी बनाता है। यही वह लक्ष्य का केंद्र बिंदु है जिस पर एनएसजी को गौर करना चाहिए और इस मोर्चे पर भारत उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
हमारे देश के खिलाफ जो अनाप-शनाप तर्क दिए जा रहे हैं, हमें उन पर ध्यान नहीं देना चाहिए। एक साधारण सा तथ्य है कि यहां दुनिया की आबादी का छठवां हिस्सा बसता है, जिसने कभी परमाणु प्रसार को बढ़ावा नहीं दिया और जो हमेशा परमाणु शक्ति के जिम्मेदार दोहन को लेकर अग्रणी रहा है। भारत को विकास की खातिर अपने आर्थिक इंजन को गति देने के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन के तौर पर परमाणु ऊर्जा की जरूरत है। वैसे यह सहजबुद्धि की बात भी नहीं लगती कि भारत के विकास पथ को रोकने के लिए कोई वैश्विक गुटबंदी हो सकती है।
इस पुरातन और ठीक तरह से काम न कर रही नाभिकीय व्यवस्था को मौजूदा समय की चुनौतियों का सामना करने के लिहाज से सुधारने की जरूरत है। शांति और भरोसे के लिए परमाणु शक्ति के वैश्विक प्रतिमानों में सुधार की बात आगे बढ़ाने के लिए भारत से बेहतर और कोई देश नहीं हो सकता। भारत-अमेरिका परमाणु करार के जरिए यही करने की कोशिश की गई है।
भारत की परमाणु शक्ति तक पहुंच के विरोध में इस गैर-जरूरी तर्क में दो अप्रासंगिक मसले अक्सर जोड़ दिए जाते हैं- एक तो पाकिस्तान से संबंधित है, और दूसरा ईरान व उत्तर कोरिया जैसे देशों से। यह कहा जाता है कि भले ही भारत को शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए परमाणु शक्ति दी जाए, लेकिन उससे पाकिस्तान के साथ परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ जाएगी। इसके साथ-साथ, यह भी तर्क दिया जाता है कि उत्तर कोरिया और बाकी दुष्ट देश अपने कुत्सित उद्देश्य के लिए परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए भारत की मिसाल दे सकते हैं।
दुखद ढंग से ये तर्क एक बार फिर मौजूदा अधूरी नाभिकीय व्यवस्था को ही दर्शाते हैं। क्या वैश्विक व्यवस्था इतनी लाचार है कि यह परमाणु शक्ति के अवैध इस्तेमाल को रोक नहीं सकती? यदि ऐसा है तो इस व्यवस्था को तुरंत सुधारना होगा। सबसे ज्यादा दुखद बात तो यह है कि एनएसजी के देशों को सिर्फ इसलिए भारत पर पाबंदी लगाने की इजाजत दी गई क्योंकि अपनी कमियों की वजह से दुष्ट देशों पर उनका जोर नहीं चल पाता। आखिर मौजूदा नाभिकीय व्यवस्था की कमियों की कीमत भारत क्यों चुकाए? यदि मौजूदा व्यवस्था दुष्ट देशों का फन कुचलने में सक्षम नहीं है और सिर्फ बुरे लोगों के खिलाफ बेहतर तर्क जुटाने के लिए अच्छे लोगों पर प्रतिबंध लगाए तो हम इसके अलावा और क्या कह सकते हैं कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है।
इस ग्रह के सभी विधायिकाओं के सम्मानित सदस्यों और अमेरिकी कांग्रेस को इस क्रम में एक समग्र रवैया अपनाना होगा। इस सुधारवादी रवैये के तहत दुष्ट देशों और गैर-राष्ट्रीय तत्वों को घेरने के लिए उचित नीति बनानी होगी, न कि इनके संदर्भ में दिए जा रहे अप्रासंगिक तर्को के समक्ष सिर झुकाया जाए।
जहां दुनिया की आबादी का छठवां हिस्सा रहता है और जिसे वास्तव में इसकी जरूरत है ऐसे भले देशों पर प्रतिबंध लगाना बंद करें, वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि आप दुष्ट और संकट के जनक देशों पर लगाम नहीं कस सकते।
-लेखक इमेजइंडिया इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं।