संपादकीय. भले ही भारतीय संसद में महिला आरक्षण बिल अभी अटका हो, पर भारतीय महिलाएं दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं।
अमेरिकी पत्रिका फोब्र्स द्वारा 2008 की विश्व की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में दो राजनीतिक स्तर पर सक्रिय भारतीय महिलाएं शामिल हैं- एक हैं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जो इस साल 21वें स्थान पर हैं। दूसरी हैं उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती जो ५९वें पायदान पर हैं।
मायावती को इस सूची में पहली बार शामिल किया जाना आश्यर्चजनक नहीं है, क्योंकि फोब्र्स के अनुसार वह भारतीय राजनीति का उभरता सितारा हैं और देश की सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य की मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने का सफर तय करने की उनकी संभावना प्रबल है।
ऐसी किसी सूची में जहां शीर्ष दस महिलाओं में छह अमेरिकी हों, अधिकतर नाम पश्चिमी देशों से हों, और जहां कॉरपोरेट व उद्योग जगत की महिलाओं का वर्चस्व हो, वहां भारतीय महिलाओं के नाम होना अपने आप में बदलते भारत की सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य की विशिष्ट कहानी कहता है।
यह बात अलग है कि भारतीय मूल की दो अन्य महिलाएं, किरण मजूमदार शॉ और इंदिरा नूयी, जो इस सूची में हैं वे कॉरपोरेट जगत से हैं। अब इस बात में संदेह नहीं होना चाहिए कि भारतीय उद्योग जगत भी वैश्विक संदर्भ में उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है जितना भारतीय महिलाओं के सशक्तीकरण की प्रक्रिया। आज भारत में महिलाएं समाज के हर क्षेत्र में अपनी जगह बना रही हैं और इसके लिए उनकी अपनी शिक्षा, इच्छाशक्ति और सामाजिक छवि का ही योगदान है।
यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि भारतीय परिवारों में महिलाओं को जो स्थान पारंपरिक रूप से मिलता रहा है, वह भी आज के इस सकारात्मक बदलाव के कारणों में एक है।
महिलाओं द्वारा धार्मिक क्षेत्रों में ऐसे मुकाम हासिल करना जिनके बारे में अभी तक सोचा भी नहीं जा सकता था तथा अनेक मामलों में बेटियों द्वारा वह कर दिखाना जो बेटे न कर पाएं, इस बात का संकेत है कि अब महिलाओं के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को बंधनों में नहीं बांधा जा सकता।
उन्हें आरक्षण मिल जाने के बाद इस प्रक्रिया में तेजी ही आएगी। जरूरत है इस सोच को अपनाने की कि आज हर क्षेत्र में महिलाओं को भी उतने ही मौके मिलें जितने पुरुषों को मिलते हैं।