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अल्टरनेटिव कालेजों में हड़कंप

रायपुर. अल्टरनेटिव (वैकल्पिक) चिकित्सा की 16 पद्धतियों को मापदंड के अनुरुप नहीं बताने से सैकड़ों छात्र-छात्राओं में बेचैनी है। राज्य में ऐसे कई कालेज हैं जो अल्टरनेटिव के नाम पर एलोपैथी सिखाते हैं, जबकि उन्हें अल्टरनेटिव कोर्स चलाने की मान्यता भी नहीं है।

चिकित्सा शिक्षा विभाग ने साफ कह दिया है कि ये कालेज केवल एमबीबीएस और बीएएमएस डाक्टरों को यह पद्धति सिखा सकते हैं, वह भी विभाग में पंजीयन के बाद। 10वीं-12वीं के बाद सीधे डाक्टर बनाने का दावा करने वाले कालेजों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाएगी। इधर अल्टरनेटिव कालेजों का कहना है कि संविधान ने उन्हें इलाज कराने की छूट दी है।

भास्कर संवाददाता ने चिकित्सा शिक्षा के निर्देश के बाद अल्टरनेटिव कालेजों की पड़ताल की। कालेजों के निरीक्षण और छात्रों से बातचीत में कई चौंकाने वाले तथ्य मिले। राज्य में अल्टरनेटिव के सौ से ज्यादा कालेज संचालित हैं। इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक कालेज अल्टरनेटिव के नाम पर इंजेक्शन लगाना सिखा रहे हैं और 10वीं-12वीं पास छात्रों को सीधे डाक्टर बनाने के सपने दिखा रहे हैं। कई कालेज केवल कागजों में चल रहे हैं। मोटी फीस लेकर घर बैठे फर्जी और अमान्य डिग्री बांटी जा रही है। इन कालेजों ने स्वास्थ्य मंत्री से मिलकर मान्यता देने की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित हाईपावर कमेटी ने अपनी अनुशंसा दी है जिसमें अल्टरनेटिव की 16 पद्धतियों को चिकित्सा मापदंडों के अनुरुप नहीं पाया गया है। केंद्र सरकार ने हाईपावर कमेटी की अनुशंसा सभी राज्यों को भेज दी है। राज्य चिकित्सा शिक्षा विभाग को यह अनुशंसा कुछ दिन पहले मिली। जिसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने अल्टरनेटिव कालेजों को नोटिस जारी करने का फैसला किया है।

इसके डायरेक्टर डा. एसएल आदिले का कहना है कि कमेटी की अनुशंसा में नान डाक्टरों के लिए पूर्णकालिक कोर्स गैरकानूनी है। जो कालेज नान डाक्टरों के लिए इस तरह के कोर्स चला रहे हैं और डाक्टर बनाने का दावा कर रहे हैं वे गैर मान्यता प्राप्त है। एलोपैथी, आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, प्राकृतिक चिकित्सा एवं होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति के अलावा अलावा किसी भी पद्धति से प्रशिक्षित लोग नाम के आगे डाक्टर नहीं लिख सकते।

ये हैं 16 पद्धतियां
हाईपावर कमेटी ने इलेक्ट्रोपैथी, इलेक्ट्रोहोम्योपैथी, एक्यूपंचर, मेग्नेटो चिकित्सा, रेकी, रिफ्लेक्सोलाजी, मूत्र चिकित्सा, स्व मूत्र चिकित्सा, हिप्नोथेरेपी, एरोमाथेरेपी, कलर थेरेपी, प्राणिक हीलिंग, जेम एवं स्टोनथेरेपी और संगीत चिकित्सा को मापदंडों के अनुरूप नहीं पाया है। इस पद्धति से चिकित्सा की अनुमति उन्हीं डाक्टरों को है जो मान्यता प्राप्त हैं। राज्य में एलोपैथी, आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, प्राकृतिक चिकित्सा और होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति से प्रशिक्षित और पंजीकृत डाक्टर ही मान्यता प्राप्त हैं।

एलोपैथी डाक्टर विरोध में
अल्टरनेटिव को कंप्लीमेंट्री मेडिसीन की श्रेणी में माना जाता है। छत्तीसगढ़ डाक्टर्स एसोसिएशन आफ कंप्लीमेट्री मेडिसिन के अध्यक्ष डा एमएस भदौरिया का कहना है कि संविधान की धारा 19 (1) बी में अल्टरनेटिव चिकित्सा पद्धति से इलाज करने का अधिकार है। हाईकोर्ट ने भी उनके पक्ष में फैसला दिया है। हाईपावर कमेटी की अनुशंसा एमबीबीएस डाक्टरों ने तैयार की है। उस कमेटी में अल्टरनेटिव का एक भी जानकार नहीं था। हालांकि उन्होंने माना कि 90 फीसदी अल्टरनेटिव कालेज छात्रों को गुमराह कर रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए।

कैसे-कैसे प्रलोभन
अल्टरनेटिव के नाम पर राज्यभर में फर्जीवाड़ा चल रहा है। ये कालेज 10वीं-12वीं पास छात्र-छात्राओं को डाक्टर बनाने का दावा करते हैं। इन कालेजों में तीन वर्षीय बीएसएमएस (एएम), दो वर्षीय डीएएमएस (एएम) और एक वर्षीय बीईएमएस (ईएम) कोर्स चलाए जा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों के छात्रों को ये कालेज कई तरह के प्रलोभन देते हैं। उनसे हर साल 12 से 15 हजार रुपए फीस वसूली जाती है। इन कालेजों ने दो-तीन कमरों में हास्पिटल खोल रखें हैं, जहां मुफ्त इलाज किया जाता है। गरीब लोग मुफ्त के चक्कर यहां इलाज कराने आते हैं। छात्र उनका इलाज कर एक्सपेरिमेंट करते हैं। कालेज छात्रों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें एक लाख के बीमे का प्रलोभन भी दिया गया है।

मान्यता के दावे भी
नर्सिग होम में एलोपैथी से इलाज का अधिक प्रचलन हैं। वहां अल्टरनेटिव की 16 पद्धतियों से इलाज नहीं होता। इसके बावजूद अल्टरनेटिव कालेज अपने कोर्स को नर्सिग कालेजों में मान्य होने का दावा करते हैं। पंडरी स्थित सीजी अल्टरनेटिव कालेज का दावा है कि उनके कोर्स से प्रशिक्षित व्यक्ति को 21 नर्सिग होम में प्रेक्टिस करने की मान्यता है।

इसी तरह कटोरा तालाब स्थित सूर्या मेडिकल कालेज, इंडियन अल्टरनेटिव कालेज और समता कालोनी स्थित पीजी अल्टरनेटिव कालेज (मार्डन मेडिकल) 10वीं-12वीं पास छात्रों को डाक्टर बनाने का दावा करते हैं। सूर्या मेडिकल के संचालक प्रहलाद जयरानी का कहना है कि हाईकोर्ट ने अल्टरनेटिव कोर्स चलाने की मान्यता दी है। पीजी कालेज प्रबंधन भी हाईकोर्ट का हवाला दे रहे हैं। इनके कालेज ब्लाक स्तर तक हैं।

पंजीयन जरूरी
चिकित्सा संबंधी कोर्स चलाने के लिए सभी संस्थानों को चिकित्सा शिक्षा संस्थान नियंत्रण अधिनियम 1973 के अंतर्गत राज्य शासन से अनुमति लेना अनिवार्य है। राज्य व केंद्र शासन द्वारा गठित वैधानिक तकनीकी परिषद ही संस्था को मान्यता देने का अधिकार है। गैर मान्यता प्राप्त संस्था चलाने वाले पर तीन लाख जुर्माना और एक साल की सजा का प्रावधान है।

डीएमई डा. आदिले ने बताया कि प्रदेश में अभी तक एक भी मान्यता प्राप्त पैरामेडिकल संस्था संचालित नहीं है। यदि कोई संस्था पैरामेडिकल कोर्स चला रहे हैं तो वह गैर कानूनी है। वहां से पढ़कर निकलने वाले विद्यार्थियों का पंजीयन पैरामेडिकल काउंसिल में नहीं होगा।





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