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कर ली दुनिया मुट्ठी में

दुनिया को जीतने के इनके उतावलेपन की जितनी तारीफ की जाए, कम है।नए जमाने के ये सितारे हर काम जल्दबाजी में करने पर यकीन रखते हैं और इंतजार जैसा शब्द तो शायद इनकी डिक्शनरी में है ही नहीं। बेफिक्र और मुकाबलों में अपना सब कुछ झोंक देने को तैयार ये युवा खेलों की दुनिया के नए महाराज बनकर उभरे हैं। आक्रामक अंदाज इनमें से ज्यादातर की सबसे बड़ी ताकत है। मैदान पर इनका जोश और प्रशंसकों को दीवाना बनाने का अंदाज निराला है।

चपल-चतुर साइना

महज 18 साल की साइना नेहवाल बड़ी प्रतियोगिताओं में देश की उम्मीदों का केंद्र बनती जा रही हैं। बैडमिंटन कोर्ट पर बेहद चपल साइना दुनिया की शीर्ष 20 शटलरों में शामिल हैं। टेनिस स्टार सानिया मिर्जा के ही शहर हैदराबाद से जुड़ीं साइना के खेल के प्रति समर्पण भाव की तारीफ प्रकाश पादुकोण और गोपीचंद जैसे शीर्ष खिलाड़ी भी करते हैं।

दुनिया की पांचवें नंबर की खिलाड़ी वांग चेन को हराकर साइना बीजिंग में पदक के बहुत करीब पहुंच गई थीं, लेकिन क्वार्टर फाइनल में मारिया क्रिस्टीन युलियांती से हार गईं। 2006 की फिलीपींस ओपन चैंपियन साइना ने ओलिंपिक में पदक चूकने के बाद स्वीकार किया कि वे अपेक्षाओं के दबाव को झेल नहीं पाईं।

आशय साफ है नजदीकी मैचों में उन्हें अपने खेल को अभी और निखारना है। उम्र उनके साथ है, लंदन ओलिंपिक और दूसरी बड़ी बैडमिंटन प्रतियोगिताओं में वे भारत की झंडाबरदार हो सकती हैं।

तेज गेंदबाजी में नई सनसनी

क्रिकेट जगत में भारत को स्पिनरों का देश कहा जाता है, ऐसे में यहां के किसी तेज गेंदबाज को 150 किमी प्रति घंटा से अधिक की रफ्तार से गेंद फेंकते देखना वाकई रोमांचकारी अनुभव है। देश की बड़ी उम्मीद माने जा रहे 20 वर्षीय ईशांत शर्मा ने जब एडीलेड में यह उपलब्धि हासिल की तो एक तरह से यह भारतीय क्रिकेट के नए दौर का आगाज था।

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में ईशांत ने रिकी पोंटिंग को इस कदर परेशान किया कि कंगारू कप्तान को भी उनकी प्रशंसा करनी पड़ी। ईशांत ऑस्ट्रेलिया दौरे पर एक साधारण खिलाड़ी बनकर गए थे, लेकिन लौटे स्टार बनकर। आईपीएल में वे रिकॉर्ड राशि में अनुबंधित किए गए थे। छरहरे ईशांत की खासियत लंबे स्पैल फेंकने और लगातार इम्प्रूव करते रहने की उनकी क्षमता है।

भारत में भले ही उन्हें श्रीनाथ की तरह का गेंदबाज माना जा रहा हो, लेकिन लुक और एक्शन के मामले में वे बहुत कुछ ऑस्ट्रेलिया के जेसन गिलेस्पी के तरह हैं। उनकी कद-काठी, गले तक झूलते बाल और गेंदबाजी एक्शन गिलेस्पी की याद दिलाते हैं। दो साल के छोटे से इंटरनेशनल कैरियर में ईशांत ने जिस खूबी से अपने को स्थापित किया है वह मशहूर होने की उनकी भूख को दर्शाता है। दोस्तों और साथी खिलाड़ियों में वे ‘लंबू’ के नाम से लोकप्रिय हैं।

करिश्माई तैराक फेल्प्स

अमेरिका के 23 वर्षीय माइकल फेल्प्स मानो तैराकी के लिए बने हैं। मजबूत हाथों से लहरों को काटते हुए वे जब तेजी से आगे बढ़ते हैं तो लगता है कि उनका मुकाबला केवल अपने आप से ही है। फेल्प्स जिस तेजी से विश्व रिकॉर्ड और पदक अपने नाम कर रहे हैं, उससे लगता है कि कैरियर के समाप्ति तक वे सोने की छोटी खान बराबर स्वर्ण इकट्ठा कर लेंगे।

ओलिंपिक में सात स्वर्ण जीतने का मार्क स्पिट्ज का वर्ल्ड रिकॉर्ड फेल्प्स की नजर पड़ने तक ही अजेय था। बीजिंग में आठ स्वर्ण लूटकर फेल्प्स ने ओलिंपिक में अपने पदकों की संख्या 16 (14 स्वर्ण और दो कांस्य) तक पहुंचा ली है। फेल्प्स बचपन में अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी (एडीएचडी) से पीड़ित थे। वे अपने को किसी काम में एकाग्र नहीं कर पाते थे। तैराकी में हाथ आजमाने के बाद तो मानो उनकी दुनिया ही बदल गई।

टीनएजर के रूप में फेल्प्स ने वही गलतियां कीं, जो आम युवा करते हैं। 2004 में 19 साल की उम्र में वे शराब पीकर ड्राइव करते हुए गिरफ्तार हो चुके हैं। फेल्प्स इस समय केवल विज्ञापनों से ही करीब 50 लाख डॉलर कमाते हैं। स्विम सूट कंपनी स्पीडो भी उन्हें 10 लाख डॉलर देने की घोषणा कर चुकी है। ओलिंपिक में इतिहास रचने के बाद उनकी छवि ‘ममाज बॉय’ के रूप में देखने को मिली। आठवां स्वर्ण जीतते ही वे दर्शकदीर्घा में मौजूद अपनी मां और बहन के पास पहुंचे और आर्शीवाद लिया।

नेशनल हीरो

ओलिंपिक का तनाव झेलना आसान नहीं होता। बात अगर वर्षो से स्वर्ण के लिए तरस रहे देश भारत की हो तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं, लेकिन 26 वर्षीय अभिनव बिंद्रा ने इस मौके पर गजब की परिपक्वता का परिचय दिया। बीजिंग में स्वर्ण जीतकर वे नेशनल हीरो बन चुके हैं।

विक्टी स्टेंड पर अभिनव की प्रतिक्रिया देखने लायक थी। उनके हावभाव में विजेता बनने का दंभ जरा भी नहीं दिखा। ऐसा लगा कि वे स्वर्ण जीतने के साथ विक्ट्री स्टेंड पर संयत रहने का भी अभ्यास कर चुके हैं। ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ को अभिनव ने बीजिंग में अपना मूलमंत्र बनाया था।

चंडीगढ़ के संभ्रांत परिवार में जन्मे अभिनव की रुचि इंटरनेट और बुक्स में है। आज जब सारा देश निहाल होकर उन पर पुरस्कारों की बरसात कर रहा है, ऐसे में संयत प्रतिक्रिया दिखाकर अभिनव यह साबित कर रहे हैं कि यह तो महज शुरुआत है। अभी बहुत कुछ करना उनके लिए बाकी है।

राफा, राफा, राफा..

टेनिस कोर्ट पर उतरते ही दर्शक दीर्घा में ‘राफा-राफा’ की आवाजें तेज होने लगती हैं। स्पेन के 22 वर्षीय राफेल नडाल को एक वर्ष पहले तक केवल क्ले कोर्ट का महारथी माना जाता था, लेकिन ग्रास कोर्ट पर इस वर्ष के उनके प्रदर्शन ने इस धारणा को बदल डाला है। रिकॉर्ड 237 सप्ताह तक टॉप टेनिस खिलाड़ी रहे रोजर फेडरर के सिंहासन को उखाड़ना नडाल की महान उपलब्धि है। इस वर्ष फ्रेंच ओपन और विंबलडन खिताब के साथ बीजिंग ओलिपिंक में भी स्वर्ण जीतकर उन्होंने अपने ताज में नए सितारे जड़े हैं।

नडाल अब तक पांच ग्रैडस्लैम सहित 31 खिताब और करीब दो करोड़ यूएस डॉलर (लगभग 87 करोड़ रु.) की राशि अपने नाम कर चुके है। बाएं हाथ का यह खिलाड़ी कोर्ट पर जितना ऊर्जावान है, व्यक्तिगत जिंदगी में उतना ही शांत। वे अभी भी अपने पिता और छोटी बहन मारिया इसाबेल के साथ गृहनगर मलरेका में रहते हैं।

दोस्तों के अनुसार कामयाबी ने राफेल को जरा भी नहीं बदला है। मैचों के दौरान अपना ट्रेडमार्क कैप्री पेंट पहनने वाले नडाल फुर्सत के क्षणों में अभी भी वीडियो गेम खेलते हैं। गोल्फ और फिशिंग के अलावा गर्लफ्रेंड मारिया फ्रांसेस्का जिस्का के साथ बीच पर सर्फिग के लिए जाना भी उन्हें बहुत पसंद है। अशक्त बच्चों को चिकित्सा और शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध कराने के कार्य से भी वे जुड़े हुए हैं।





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