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नि:शब्द आतंकवाद की अदृश्य दीवारें

दृष्टिकोण. मीडिया के एक वर्ग में इस बात की वकालत शुरू हो गई है कि अगर कश्मीर घाटी के लोग भारत के साथ अपना भाग्य जोड़े रखने को तैयार नहीं हैं तो उन्हें ऐसा करने की बाकायदा इजाजत दे देनी चाहिए। कश्मीर के लोगों को अपने भाग्य के भरोसे छोड़ देना चाहिए। वे ही तय करें कि किस तरह से जीना चाहते हैं - पाकिस्तान में शामिल होकर या किसी स्वायत्त इकाई की तरह।

तर्क यह दिया जा रहा है कि अगर ऐसा होता है तो भारत को एक बड़ी समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। यह बात थोड़ी इसलिए गले उतर सकती है कि घाटी में पिछले कई दिनों से लाखों की संख्या में लोग आए दिन सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहां कफ्यरू का उल्लंघन हो रहा है और कश्मीरियों के शब्दों में कहें तो वे ‘फौज की ज्यादतियां’ भी झेल रहे हैं, पर देश के बाकी हिस्सों में इसे लेकर कोई हलचल नहीं है। कश्मीर को लेकर आम भारतीय की ¨चता शायद एक शानदार पर्यटन स्थल तक सीमित होकर रह गई है।

ऐसे में इस तरह के सोच की दाद देने वालों की तादाद बढ़ भी सकती है जो घाटी के बिगड़ते हालात को लेकर और ज्यादा परेशान नहीं होना चाहते। कश्मीरियों की यह शिकायत अपनी जगह कायम रह सकती है कि घाटी में इतना कुछ हो रहा है पर ‘इंडियन मीडिया’ पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है। पर कश्मीर समस्या का हल उतना आसान भी नहीं है जैसा कि सुझाया जा रहा है।

भारत, पाकिस्तान और कश्मीर तीनों ही पक्षों से जुड़ा एक बड़ा वर्ग उन लोगों का है जिनके घाटी को एक समस्या के रूप में जिंदा रखने के पीछे गहरे निहित स्वार्थ हैं। दोनों ही मुल्कों में प्रतिरक्षा के नाम पर खर्च होने वाला अरबों रुपए का वार्षिक बजट, उससे जुड़ी नौकरशाही, उसके नाम पर की जाने वाली राजनीति और सबसे बड़ा यह कि हिंदू-मुस्लिम विभाजन को ग्रास रूट तक ले जाने की सत्ता की राजनीति-सबकुछ इन निहित स्वार्थ रखने वाले तत्वों के लिए दांव पर लगा हुआ है।

यह तो हाल के दिनों के हालात हैं कि कुछ तो अपनी अंदरूनी राजनीतिक परेशानियों के चलते और कुछ अफगानिस्तान की स्थिति के कारण पाकिस्तान ज्यादा गंभीर संकटों में उलझ गया है वरना इस्लामाबाद की पूरी राजनीति तो अब तक कश्मीर पर ही टिकी हुई थी।

दूसरे यह भी कि घाटी में विरोध का जो लोग नेतृत्व कर रहे हैं उनमें न तो कोई यासर अराफात है और न ही कोई शेख मुजीबुर्रहमान। कश्मीर में ‘भारत-विरोध’ का नेतृत्व कौन सर्वमान्य नेता कर रहा है यह स्पष्ट नहीं है। ऐसा होने की संभावनाएं भी दूर-दूर तक नहीं हैं।

पर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन को लेकर घाटी और जम्मू में चल रहे अलग-अलग आंदोलनों को एक नए नजरिए से देखने की जरूरत है जो शायद कश्मीर समस्या के किसी संभावित हल से भी ज्यादा मुश्किल साबित हो सकता है।

फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में पिछले दिनों यह आरोप लगाया था कि भारत में मुस्लिम भेदभाव के शिकार हो रहे हैं। अपने आरोप की पुष्टि में उन्होंने कहा कि वे मुंबई में एक फ्लैट खरीदना चाहती थीं पर उनके मुस्लिम होने के कारण ऐसा मुमकिन नहीं हो सका। उनके मुताबिक ऐसा ही सैफ अली खान के साथ भी हुआ।

शबाना के आरोप को लेकर भाजपा सहित कई हिंदू संगठनों व कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति व्यक्त की। शबाना का आरोप इस आधार पर गलत करार दिया गया कि शाहरुख व सलमान सहित कई मुस्लिम सितारा हस्तियां मुंबई में शानदार आवासों में रह रही हैं। पर शबाना का आरोप केवल इसी आधार पर खारिज भी नहीं किया जा सकता कि कुछ मुस्लिम हस्तियों को हमने राष्ट्रीय समृद्धि में भागीदार बना रखा है।

हकीकत यह भी है कि शहरों में बस्तियां जातियों के नाम पर बांटी और बसाई जा रही हैं। मुस्लिम बस्तियां शहरों के कुछ खास इलाकों में और बाकी रहवासी दूसरी बस्तियों में विभाजित होकर बसते जा रहे हैं। ऐसा किसी योजना के तहत नहीं बल्कि स्वप्रेरित भाव से और यंत्रवत हो रहा है।

देश में जातिगत वैमनस्य बढ़ाने की आईएसआई की कोशिशें अब इसलिए बेमानी हो गई हैं कि जाने-अनजाने हर शहर ने अपने-अपने पाकिस्तान खड़े कर लिए हैं। बहुसंख्यक आबादी और मुस्लिमों के बीच बिना किसी प्रयास के आकार लेता यह भावनात्मक विभाजन और उसके कारण पैदा होता एक-दूसरे के प्रति संदेह और उससे पैदा होने वाले भय का माहौल शायद किसी भी कश्मीर समस्या से ज्यादा परेशान करने वाला होना चाहिए।

मजहब, मान्यताओं और अंधविश्वासों की बुनियादों पर न केवल बस्तियां ही खड़ी हो रही हैं, उनसे जुड़ी मूलभूत सुविधाओं की मजबूती या कमजोरियां भी यकीनों के आधार पर तय हो रही हैं। मोहल्लों और बस्तियों से प्रारंभ हुआ यह विभाजन आने वाले वक्त में पूरी व्यवस्था को अपना निशाना बना सकता है।

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के साथ फौजी तौर पर निपटा जा सकता है। कश्मीर, भारत का एक अविभाज्य अंग भी बना रह सकता है। हम अपनी सामरिक ताकत पर भी गर्व कर सकते हैं और साथ ही अपने इस यकीन पर भी कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। पर भावनात्मक तौर पर जो अदृश्य दीवारें नागरिकों के बीच खड़ी होकर जिस मौन आतंकवाद की रचना कर रही हैं वह सीमा पार से प्राप्त होने वाली किसी भी चुनौती के मुकाबले कहीं ज्यादा आत्मघाती साबित हो सकता है।

जयपुर में हुए बम धमाकों के बाद देश की एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी में कार्यरत एक मुस्लिम इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर को पूछताछ के लिए पुलिस ने नौ दिनों तक हिरासत में रखा और बाद में निर्दोष करार देकर रिहा कर दिया। पर जिस आईटी कंपनी में वह पिछले तीन वषों से कार्यरत था उसने किन्हीं अन्य कारणों का हवाला देकर उसे नौकरी से अलग कर दिया। जरूरी नहीं कि आतंकवाद हिंसक ही हो। नि:शब्द या अहिंसक आतंकवाद भी उतना ही घातक साबित हो सकता है। और इसके लिए केवल नागरिकों के बीच परस्पर संदेह और अविश्वास का वातावरण बना दिया जाना ही काफी है।





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One Indian
Monday, 1st Sep 2008, 9:06
There is no issue in giving kashmir to muslims but if INDIA has to face one more partition in name of relegion than all muslims should be asked to leave INDIA.