दृष्टिकोण.
यह अजीब स्थिति है कि लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में जिस महंगाई को ‘सदाबहार’ और सर्वाधिक राजनीतिक ज्वलनशील मुद्दा माना जाता है, उसके नित नए रिकॉर्ड बनाए जाने के बावजूद भी भारतीय राजनीति में यह दोयम दर्जे का मसला बना हुआ है।
संभव है, जब चुनाव करीब आएंगे, तब भाजपा जम्मू के मोर्चे और कम्युनिस्ट पार्टियां परमाणु करार विरोधी भंगिमा से बाहर आकर इस मामले पर थोड़ी हवा बनाने का काम करें। पर जब महंगाई पहले ही लोगों के बारह बजा चुकी हो और आम आदमी की जरूरत का हर सामान महंगा हुआ जा रहा हो, तब सरकार तो थोड़ी बेचैन लगी लेकिन विपक्ष हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
वैसे सरकार ने इस महंगाई को रोकने के नाम पर जो कुछ किया है, वह न सिर्फ अपर्याप्त है बल्कि गलत दिशा में उठाए गए कदम हैं। इनसे महंगाई तो कम नहीं हुई, वरन आर्थिक कामकाज प्रभावित हुए हैं तथा विकास दर भी प्रभावित हो सकती है।
असल में सरकार ने जो कदम उठाए हैं, वे महंगाई रोकने के लिए कम, मुद्रास्फीति घटाने के लिए ज्यादा कारगर होते। उसने कुछ चीजों का आयात बढ़ाने और निर्यात रोकने जैसे कुछेक कदम महंगाई से निबटने वाले भी उठाए हैं, पर असल काम मुद्रा की आपूर्ति घटाने का किया है। बैंकों के सूद की दर बढ़ाने, लैंडिंग रेट और मौद्रिक तरलता दर में घट-बढ़ करने का उपाय असल में तब कारगर होता है, जब बाजार में सामान तो हो, पर ज्यादा मात्रा में मुद्रा आ गई हो। पर आज जो हालत है, वह सामानों की कमी, वह भी उत्पादन की कमी के चलते पैदा हुई है। नई आर्थिक नीति ने उत्पादन की प्राथमिकताएं बदल दी हैं।
आयात-निर्यात के खिलाड़ियों के लिए बाजार उपलब्ध कराया है। इसलिए खासतौर से अनाज, तिलहन और दलहन का उत्पादन गिरा है, जबकि भारत में हरित क्रांति और जन-वितरण प्रणाली में कभी अनाज की जो आत्मनिर्भरता थी, वह पूरी तरह से सरकारी मदद के सहारे ही थी। आज सरकार ने न सिर्फ अपना हाथ खींचा है, बल्कि उसने दूसरे धंधों को सहयोग देना शुरू कर दिया है और जब संकट आ गया है, तब भी वह समस्या की तह में जाने की जगह सतही उपायों से काम चला रही है। कई अर्थशास्त्री ऐसे हैं, जो मानते हैं कि सरकार ने बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था में जोड़-तोड़ करके महंगाई को थामने की जो कोशिश की है, उसने आर्थिक प्रगति की रफ्तार को प्रभावित किया है। इन कदमों से औद्योगिक उत्पादकों के लिए पूंजी उठाना मुश्किल हुआ है और ग्राहकों के लिए ऋण महंगा होने से उनके माल की बिक्री प्रभावित होने लगी है। महंगाई से उद्योग-व्यापार जगत का एक हिस्सा जरूर लाभ में रहता है, पर ज्यादा बड़े हिस्से को नुकसान होता है।
यह माना जाता है कि बीते तीन-चार महीनों में सरकार ने महंगाई रोकने के नाम पर जो कदम उठाए हैं, उनसे आर्थिक विकास दर में एक फीसदी तक की कमी आ गई होगी। पर इसके साथ ही यह कहना भी जरूरी है कि अगर सरकार ने ये कदम न उठाए होते तो मुद्रास्फीति का आंकड़ा अभी 20 फीसदी से भी ऊपर पहुंच गया होता।
पर जिस सूचकांक को देवता मानकर हम सभी महंगाई और मुद्रास्फीति का हिसाब लगाते हैं और उसके घट-बढ़ में खुश-नाखुश होते हैं, अगर उसमें बुनियादी दोष न होते तो यह आंकड़ा शायद और ऊपर होता। हमारे सारे मूल्य सूचकांक १९८१-८२ के बने हैं और तबसे अब तक हमारे आर्थिक जीवन और उपभोग में कैसा और कितना बदलाव आया है, इसका हिसाब मुश्किल है। १९९३-९४ में जो हल्का संशोधन किया गया, वह भी अब बासी हो गया है और पुराने हिसाब से ज्यादा अलग नहीं है।
जिन चीजों से हमारा सूचकांक बनता है, उनमें सिर्फ खाने-पीने की चीजों का भारांक (वेटेज) या वजन लगभग ५क् फीसदी है। यह स्थिति १९९३-९४ के बदलाव में भी बनी हुई है। बहुत गरीब आदमी छोड़ दें तो आज सबके खर्चो में भोजन पर होने वाला खर्च कम हुआ है -संचार (खासकर मोबाइल क्रांति के बाद), स्वास्थ्य और शिक्षा (भूमंडलीकरण के युग में इन क्षेत्रों में सरकार के हाथ खींचने और निजी क्षेत्र के आने के बाद) और परिवहन का खर्च बहुत बढ़ा है। पर आप सूचकांक में शामिल चीजों और उनके भारांकों पर नजर डालेंगे तो आपको लगेगा कि अभी आप जाने किस युग में हैं।
जैसे चीनी का भारांक और गुड़-खांडसारी के भारांक में ज्यादा अंतर नहीं मिलेगा, जबकि आज इनका चलन कहीं नहीं दिखता। घरेलू ईंधन में अभी भी कोयला और चारकोल का हिसाब पर्याप्त वजन रखता है। औद्योगिक उत्पादों की गिनती में जूट का हिसाब प्रमुख बना है, जो संभवत: औपनिवेशिक शासन की औद्योगिक गतिविधियों में प्रमुख होगा। खैरियत यही है कि इसमें नील की गिनती नहीं है। जूट उद्योग को अपनी जान की पड़ी है, पर सूचकांक उसकी ‘शान’ को कम करने का नाम नहीं ले रहा है। सारा जीवन प्लास्टिक और फाइबर पर आधारित होता जा रहा है, पर उस बेचारे को यहां कोई नहीं पूछता।
अब निजी क्षेत्र की चिकित्सा और शिक्षा कितनी महंगी है। हर आदमी के जीवन और खर्चो में फोन-मोबाइल कितना शामिल है या पेट्रोलियम की कीमत उसकी यात्रा और उपभोग के सामान को कितना प्रभावित करती है, इनके हिसाब-किताब से सूचकांक मुंह ही मोड़े हुए है और सूची में शामिल चीजों को देखें तो २क्-२५ वर्ष का कोई भी युवक उनमें से आधी चीजें जानता-पहचानता भी नहीं होगा।
ऐसे में जहां मुद्रास्फीति की जगह महंगाई थामने वाले बड़े कदम अर्थात खेती की पैदावार बढ़ाने से लेकर औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने वाले कदम उठाने जरूरी हैं, वहीं वस्तुस्थिति को दर्शाने वाले सूचकांक की जरूरत भी बनी हुई है। इसके बदलने से चीजें ज्यादा स्पष्ट होकर सामने आएंगी।
- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।