संपादकीय. सरकार ने अमरनाथ संघर्ष समिति की प्रमुख मांगें मान ली हैं और समिति ने अपना आंदोलन फिलहाल स्थगित कर दिया है। ऐसे में उम्मीद करनी चाहिए कि श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड जमीन विवाद के चलते पिछले दो महीनों से जम्मू और कश्मीर में जो हिंसक आंदोलन चल रहे थे, उनका पटाक्षेप हो जाएगा।
समझौते के मुताबिक अमरनाथ यात्रियों की सहूलियत के लिए वन विभाग की 40 हैक्टेयर जमीन पर श्राइन बोर्ड का विशेष नियंत्रण रहेगा, जिस पर यात्रा के दौरान तीन महीने के लिए अस्थायी तौर पर यात्री सुविधा केंद्र बनाया जा सकेगा। बाकी स्थानीय निवासियों की ओर से अमरनाथ यात्रियों को सदियों से जो सहयोग और सहायता मिलती रही है, वह पूर्ववत जारी रहेगी। इस जमीन का मालिकाना हक वन विभाग के पास ही रहेगा।
दिलचस्प तथ्य यह है कि इस समझौता फामरूले की अधिकांश बातें वही हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद की सरकार ने सुझाई थीं, लेकिन 26 मई के उस फैसले पर आजाद सरकार की सहयोगी पार्टी पीडीपी और इस योजना की शुरुआती प्रस्तावक नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अलगाववादी हुर्रियत के साथ मिलकर ऐसा बवाल खड़ा किया कि सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा और वह गिर भी गई।
जम्मू का प्रतिक्रियात्मक आंदोलन इसी विडंबना की कोख से पैदा हुआ जिसके चलते पिछले डेढ़-दो महीने से पूरे राज्य की हालत भीषण हो गई। जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहली बार दोनों क्षेत्र एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े नजर आए और इस सारी जद्दोजहद में दर्जनों लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा।
इस समझौते को लेकर स्वाभाविक तौर पर जम्मू क्षेत्र में उत्साह का माहौल है, क्योंकि उनकी यह न्यायोचित मांगें काफी हद तक पूरी हुई हैं, लेकिन घाटी में अब भी स्थिति असहज बनी हुई है और इस समझौते को जम्मू की जीत के तौर पर देखा जा रहा है। वहां जनसामान्य को लग रहा है कि सरकार झुक गई है। यह स्थिति घाटी को अशांत बने रहने पर मजबूर कर सकती है।
इसलिए सरकार को फौरन ऐसे कदम उठाने चाहिए ताकि गलतफहमी की कोई भी गुंजाइश खत्म हो जाए। असली बात यह है कि इस समझौते को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं बल्कि शांति और सौहार्द की विजय के रूप में देखा जाना चाहिए। यही जम्मू-कश्मीर और समूचे भारत वर्ष के हित में है और कश्मीरियत का तकाजा भी है।