इंदौर.
रूठे हुए मेघों को मनाने के लिए हर कोई अलग-अलग ढंग से प्रयास कर रहा है। कोई भगवान का आह्वान कर रहा है तो कोई सुरों से बादलों को न्योता दे रहा है।
गांधी हॉल में जारी लोक संस्कृति मंच द्वारा आयोजित मल्हार उत्सव में शिरकत कर रहे कलाकार गायकी और वादन से बूंदों से गुजारिश कर रहे हैं। रविवार को मल्हार उत्सव के दूसरे एवं अंतिम दिन भी यही प्रयास किया गया। गायन, वादन और नृत्य नाटिका के बेजोड़ प्रदर्शन ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
पहले राजेश्वरी दीक्षित ने गायन का प्रारंभ राग मेघ मल्हार से किया। इसमें उन्होंने बंदिश बरखा रुत आई.. पेश किया और एक झूला व एक टप्पा व तराना पेश किया। टप्पा पंजाब के लोकगीत की परंपरा है। इसे शोरी मियां ने प्रचलित किया था। इस कठिन गायकी की विधा को राजेश्वरी ने बहुत ही सहजता से पेश किया। उनका गायन में सहयोग दिया पूर्वी निमगांवकर ने।
तबला पर सहयोग किया हितेंद्र दीक्षित ने व हारमोनियम पर थे मोहन शुक्ल। इसके बाद विट्ठल राव राजपुरा ने पखावज पर चक्करदार व फरमाइशी फरणो बजाकर मेघों का आह्वान दिया। उनके इस अंदाज से ऐसा लग रहा था कि मेघ अभी बरस पडे़गे। तीसरी कलाकार प्रियंका वैद्य और रंजना ठाकुर के निर्देशन में नृत्य नाटिका में भक्ति वृष्टि शिव वंदना नृत्य से देवी-देवताओं का आह्वान किया। नृत्य नाटिका में गणोश वंदना भी प्रस्तुत की गई।
आखिर में ग्रुप के साथ गायक अभय माणके ने दुर्लभ राग लंका दहन मल्हार तराने से समापन किया। कार्यक्रम का आगाज लानिवि मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। लोक संस्कृति मंच के अध्यक्ष शंकर लालवानी भी मौजूद थे।