Sports
Other Sports Other Sports नई दिल्ली.
बीजिंग ओलिंपिक में देश के लिए पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाले निशानेबाज अभिनव बिंद्रा स्वर्ण जीत कर भी खुद को हारा हुआ मानते हैं। बिंद्रा ने कहा, ‘निशानेबाजी ही मेरा जीवन है। पिछले 12 वर्षों से निशानेबाजी के अलावा जीवन में मैंने कुछ नहीं किया है।’
हालांकि, बिंद्रा ने माना कि खेल जीवन का एक भाग हो सकता है, पूरा जीवन नहीं। बिंद्रा के अनुसार जीवन में अन्य कई चीजें भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे अब तक इनका लुत्फ नहीं ले पाए हैं।
ओलिंपिक गौरव का मुश्किल सफर
अभिनव बिंद्रा ने कहा कि बीजिंग ओलिंपिक में सफलता हासिल करने का उनका सफर काफी मुश्किल भरा रहा, पर उन्होंने उम्मीद जाहिर की है कि बीजिंग ओलिंपिक में भारत के शानदार प्रदर्शन के कारण आने वाले एथलीटों के लिए अब पदक जीतना आसान हो जाएगा।
पढ़ने वाला बच्च थाबीबीसी के कार्यक्रम ‘एक मुलाकात’ में बिंद्रा ने कहा कि बचपन में उन्हें खेल से बहुत लगाव नहीं था, बल्कि वे तो पढ़ने वाले बच्चे थे। पर, निशानेबाजी से जुड़ने के बाद वे धीरे-धीरे पढ़ाई कम और खेल पर ज्यादा ध्यान देने लगे।
एथलीट का जीवन दिखता ग्लैमरस है
बिंद्रा ने इस कार्यक्रम में कहा कि एक एथलीट का जीवन दूर से ग्लैमरस दिखता है कि वो खेलने यहां-वहां जा रहा है, पर मेरा मानना है कि एथलीट का जीवन मुश्किलों से भरा होता है। लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरने का उस पर काफी दबाव होता है। इस दबाव को झेलना कोई हंसी-मजाक की बात नहीं है।
जैसे मैं धोखा देने जा रहा हूं
गोल्डन शूटर अभिनव बिंद्रा ने कहा है कि खेल मंत्रालय को अपने एथलीटों पर भरोसा करना चाहिए। एक निजी टीवी चैनल के साथ साक्षात्कार मे बिंद्रा ने कहा कि ओलिंपिक में जाने से पहले खेल मंत्रालय मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहा था जैसे मैं वहां उन्हें धोखा देने जा रहा हूं। उन्होंने कहा कि धिकारियों को एथलीटों में भरोसा जताने की जरूरत है।