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हल होगी दादी की जुबानी

इंदौर. दिन-रात क्यों होते हैं, जल चक्र-पर्यावरण चक्र, कार्बन यौगिक, चुंबक, विद्युत धारा और जैव विकास जैसे शब्दों या सवालों में बच्चे अब नहीं उलझेंगे। उन्हें विज्ञान की जटिलताएं समझने में कोई परेशानी नहीं होगी।

इसे आसान बनाने के लिए शहर की ही एक शिक्षिका ने दादी-नानी की जुबानी कविता व कहानियां रचीं। उनके प्रयासों को दाद दी म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् ने और सभी कक्षाओं के लिए किताबें प्रकाशित कीं जो अगले सत्र से पाठ्यक्रम में शामिल हो सकेंगी।

ये किताबें बतौर प्रयोग शहर के दस स्कूलों में भेजी गईं और सफल भी मानी गईं। अब और व्यापक स्तर पर प्रयोग किया जाएगा। उसके बाद स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल करेंगे। वैष्णव बाल मंदिर, राजमोहल्ला में शिक्षिका रहीं श्रीमती इंदू पाराशर ने ये किताबें लिखी हैं।

2003 में बेस्ट इनोवेटिव टीचर, स्टेट ऑफ द ईयर रह चुकी श्रीमती पाराशर ने बताया जब बच्चे अंग्रेजी-हिंदी सीखते हैं तभी विज्ञान की जटिल अवधारणाओं से भी जूझना पड़ता है। इसी कारण ये किताबें लिखने की जरूरत महसूस की। करीब दो साल की मेहनत के बाद सर्वोदय शिक्षण समिति के सहयोग से म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने प्रकाशित किया।

इस सत्र में पूरा होगा आकलन
परिषद के कार्यकारी संचालक नरेंद्र महरोत्रा ने बताया प्रयोग की सफलता देखकर ही पुस्तकें प्रकाशित की गईं। परिषद सभी पक्षों को देखेगी और जरूरी सुधार कर ही अगले सत्र से सभी स्कूलों में लागू करवाएगी। स्कूल शिक्षा विभाग को भी इसकी जानकारी दी है। जिला शिक्षाधिकारी माया मालवीय भी इसे लेकर अधिकारियों से संपर्क कर रही हैं।

एनिमेशन फिल्म और संगीतबद्ध करने की योजना
श्रीमती पाराशर ने बताया किताब के बाद एनिमेशन फिल्म बनाकर संगीतबद्ध करने की भी योजना है। ऐसा होने पर बच्चों को खेल-खेल में 10-12 सीडी से विज्ञान समझाया जा सकेगा।

10 स्कूलों में सफल प्रयोग
पिछले सत्र में 10 चुनिंदा स्कूलों में ये पुस्तकें पढ़ाई गईं और बच्चों की परीक्षा ली तो परिणाम 99.6 प्रतिशत रहा। ये स्कूल थे श्री वैष्णव बाल मंदिर, माधव विद्यापीठ, बालाजी गणोश मारवाड़ी, सराफा विद्या निकेतन, बी.डी. तोषनीवाल, एनी बेसेंट, हरिजन छात्रावास, हिंदी माध्यमिक विद्यालय-5, चोइथराम फाउंडेशन व नई तालीम विद्यालय, माचला।





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