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हमारी बेकरारी उनका करार

दृष्टिकोण. deal भारत में स्पष्ट तौर पर नेतृत्व का संकट इतना कभी नहीं रहा। आंतरिक सुरक्षा की स्थिति गंभीर व तनावपूर्ण है। बाहरी सुरक्षा के मोर्चे पर भी हालत कुछ बेहतर नहीं है।

अब तो लगता है कि सरकार अपना शुतुरमुर्गी रवैया छोड़ना ही नहीं चाहती। यहां तक कि सकल घरेलू उत्पाद की गिरती विकास दर भी सरकार को सक्रिय नहीं कर पाई। हमारे प्रधानमंत्री का एक ही मसले यानी भारत-अमेरिका परमाणु करार पर अड़े रहना स्पष्ट तौर पर देश के लिए काफी महंगा साबित हो रहा है।

जो उनके लिए विरासत-निर्माण का मसला रहा हो, वह देश के लिए भारी राजनीतिक समस्याएं पैदा करने वाला साबित हो सकता है। अमेरिका महसूस कर रहा है कि इस करार में अपनी ओर से भारी राजनीतिक पूंजी लगाने के बाद मनमोहन सिंह शिद्दत से इसकी सफल परिणति चाहते हैं। एक असफल करार उनके लिए भारी नुकसानदेह साबित हो सकता है। यह देखते हुए कि उन्होंने इस मसले पर अपनी साख और सरकार का भविष्य भी दांव पर लगा दिया, अमेरिका के लिए इस लिहाज से करार पर और शर्ते लादने का अवसर है। खुद एक भली भूमिका निभाते हुए परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह (एनएसजी) में अपने कुछ पश्चिमी सहयोगियों को विघ्नकारी भूमिका निभाने की मौन स्वीकृति देते हुए अमेरिका अपने यहां यह संदेश पहुंचाने में सफल रहा है कि एनएसजी बिना शर्त अपने नियमों में रियायत देकर इसे मंजूरी नहीं देगा। इस संदेश का प्रभाव यह है कि भारत ने वांछित परिणाम हासिल करने के लिए खुद ही अपना लक्ष्य बदल दिया है। अब वह एनएसजी से ‘स्पष्ट और बिना शर्त’ छूट के बजाय महज ‘स्पष्ट’ रियायत चाहता है।

इसका सीधा आशय है कि नई दिल्ली एनएसजी की रियायत को स्वीकार कर लेगी, यदि इसमें निहित शर्त्े इस तरह वर्णित हों कि यह सार्वजनिक तौर पर अपना चेहरा बचा सके। एक ‘स्पष्ट’ रियायत ऐसी होगी जिसकी शर्त्े जबरन दखलंदाजी करने वाली न हों। कुछ शर्त्े जो पहले वाले अमेरिकी मसौदे में अंतर्निहित हैं- जिन पर 21-22 अगस्त को एनएसजी की मीटिंग में चर्चा हुई- वे स्पष्ट हो सकती हैं।

पूर्व का मसौदा बेहद चतुराई से तैयार किया गया, हालांकि सार रूप में यह हाइड एक्ट के अनुकूल है। पहली बात, यह भारत से एनएसजी के सभी नियम-कायदों के प्रति स्वीकृति की मांग कर भारत के चारों ओर एक व्यापक परमाणु अप्रसार का जाल फैलाना चाहता है।

भारत को अपनी कुछ सैन्य परमाणु सुविधाओं को बरकरार रखने की इजाजत देने के बावजूद सभी उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिहाज से परमाणु-हथियार संपन्न देश नहीं माना जाएगा और इस तरह परमाणु अप्रसार संबंधी शर्ते इस पर लागू होंगी- यह प्रावधान हाइड एक्ट में भी निहित है। यह शर्त एनएसजी की रियायत में भी बरकरार रहेगी। दूसरा, पूर्व के मसौदे में भारत के परमाणु परीक्षण पर प्रतिबंध की जो बात परोक्ष ढंग से कही गई थी, वह अब संभवत: ज्यादा स्पष्ट हो सकती है।

खारिज मसौदे में पहले भारत की परीक्षण के स्थगन समेत बाकी प्रतिबद्धताओं को दर्ज किया गया था और इसके पश्चात ‘सुरक्षित’ भारतीय परमाणु सुविधाओं के लिए निर्यात की अनुशंसा की गई, ‘बशर्ते यह हस्तांतरण एनएसजी के पहले और दूसरे भाग के सभी दिशा-निर्देशों में वर्णित बाकी सभी प्रावधानों के हिसाब से हो।’

यह देखते हुए कि ये दिशा-निर्देश गैर-परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्रों से संबंधित हैं, भारत से ऐसी सभी गतिविधियों को त्यागने के लिए कहा गया जो किसी गैर-परमाणु-हथियार संपन्न राष्ट्र के लिए वर्जित हैं। लेकिन अब जबकि एनएसजी के कई सदस्य ज्यादा स्पष्ट प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं, यह देखते हुए विकल्प यही है कि हाइड एक्ट की धारा 106 की भाषा को दोहराया जाए अथवा 123 करार की तरह शब्दों की बाजीगरी की जाए। तीसरा, भारत की असैन्य परमाणु संवर्धन और प्रसंस्करण तकनीकों तक पहुंच रोकने के मसले पर एनएसजी के समक्ष परमाणु परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने से जुदा विकल्प नहीं है।

पूर्व के मसौदे में ऐसी तकनीकों के निर्यात पर ऐसी शर्त के जरिये प्रतिबंध निहित था कि इस तरह के हस्तांतरण एनएसजी दिशा-निर्देशों के प्रावधानों के मुताबिक हों। एनएसजी के दिशा-निर्देश के दूसरे भाग की धारा 4 में तो सुरक्षा मानकों के अधीन भी प्रसंस्करण व संवर्धन के उपकरण व तकनीक देने से इंकार किया गया है। जहां हाइड एक्ट में एक स्पष्ट प्रतिबंध समाविष्ट है, जिसमें यहां तक कहा गया कि अमेरिका एनएसजी के सदस्य देशों के साथ व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर काम करते हुए भारत को भविष्य में ऐसी तकनीक हस्तांतरित करने से रोकने के लिए अधिकारसंपन्न बनाता है।

रियायत जो भी अंतिम आकार ले, कड़वा सच यही है कि 18 जुलाई 2005 को अमेरिका के साथ संयुक्त वक्तव्य जारी करते हुए भारत ने सद्भावना के तहत जो भी घोषणाएं की थीं, अब वे सब हाइड एक्ट में परोक्ष रूप से और 123 करार में स्पष्ट तौर पर उल्लेखित होने के बाद बंधनकारी, प्रवर्तनीय प्रतिबद्धताओं में तब्दील हो रही हैं।

आज भारत को एकपक्षीय तौर एक कार्टेल के दिशा-निर्देशों का अनुसरण करने के लिए कहा जा रहा है, जो भारत को एक सदस्य के तौर पर स्वीकार नहीं करता। यदि एनएसजी भविष्य में नई शर्त्े थोपने के लिए अपने दिशा-निर्देशों में तब्दीली करता है (वैसे भी खारिज मसौदे से यह आशंका होने लगी है कि बाद में होने वाले किसी भी संशोधनों में नई-दिल्ली से सिर्फ सलाह-मशविरा होगा, उसकी ज्यादा सुनी नहीं जाएगी) तो भारत आयातित, विदेशर्ी ईधन पर निर्भर रिएक्टरों में अरबों डॉलर का निवेश करने के बाद खुद को असहज स्थिति में पाएगा।

भारत में यह करार इस वजह से बेहद विवादास्पद हो गया, क्योंकि इसे राजनीतिक तौर पर सही तरीके से व्यवस्थित नहीं किया गया। घरेलू स्तर पर इसे एक विवादास्पद मसले में बदलकर नई दिल्ली ने आगे की बातचीत के लिए अपने पक्ष को कमजोर किया है। ऐसे में यह कोई अचरज की बात नहीं कि जैसे-जैसे करार की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, इसके हर स्तर पर नई-नई शर्ते सामने आ रही हैं। एनएसजी की प्रक्रिया भी इसका अपवाद नहीं है, लेकिन एनएसजी से जो भी नतीजे मिलें, समझदारी इसी में है कि इसे देश की एक और ‘विजय’ के तौर पर भुनाने के बजाय हम उन्हें अब तक के प्रयासों के लिए धन्यवाद देते हुए आगे के लिए हाथ जोड़ लें।
- लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।





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