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वनेश्वरी का जीवन संवारेगा संतोष

धमतरी. santosh सिर्फ एक पुत्री के जन्म पर उसके पालन-पोषण और शादी को लेकर चिंतित हो जाने वाले समाज के सामने खेतों की रखवाली कर परिवार की आजीविका चलाने वाले एक युवक ने मिसाल पेश की है।

आधे दर्जन बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी पहले ही निभा रहे उस युवक ने जंगल में मिली एक बच्ची का पालन-पोषण अपनी पांच बच्चियों की तरह करने का बीड़ा उठाया है। एक लाख रुपए के बदले उस बच्ची को देने की मांग भी उसने ठुकरा दी है।

जिले के मगरलोड विकासखंड में मोहंदी के समीप बसे ग्राम बेलोरा का संतोष चंद्राकर (34) फसलों को मवेशियों से बचाने के लिए गांव भर के खेतों में घूमता है। उसने ‘दैनिक भास्कर’ को बताया कि बीते 23 अगस्त को वह खेतों की रखवाली करते हुए कमार डेरा के पास पहुंचा, तो ग्राम छिपली निवासी एक चरवाहे ने बताया कि जंगल से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही है। पहले तो उसे इस पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन कुछ समय बाद वह जब जंगल में शौच के लिए गया तो उसने भी बच्चे के रोने की आवाज सुनी। इस पर उसने चरवाहे के साथ मिलकर जंगल छान मारा, लेकिन बच्च नहीं मिला।

उसने बताया कि थोड़ी देर बाद पेट में तकलीफ होने पर वह दोबारा शौच के लिए गया, तो उसे फिर बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। इस बार उसने आवाज की दिशा में आगे बढ़कर झाड़ियों की जगह ऊंचे पेड़ों पर नजर दौड़ाई। उसे भिरहा पेड़ पर एक बड़ा घोंसला दिखाई दिया, जहां से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। वह दौड़कर अपनी पत्नी हेमलता और गांव वालों को बुला लाया। इसके बाद लोगों की मदद से पेड़ से बच्ची को उतारा। बच्ची के शरीर पर कपड़े थे तथा उसकी नाल नहीं काटी गई थी। घोंसले में एक स्टील के कप में दूध रखा था, जो जम गया था।

पेड़ के नीचे नीबू के तीन टुकड़े पड़े मिले। वह बच्ची को अपने घर ले आया और पुलिस को खबर दी। बच्ची को देखने गांव वालों की भीड़ उसके घर उमड़ पड़ी, क्योंकि इस दिन साप्ताहिक बाजार था। गांव वालों तथा पुलिस ने मौके पर काफी खोजबीन की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। संतोष ने बताया कि बच्ची को देखने पहुंचे कई लोगों ने उसे प्रलोभन दिया। चंपारण्य से पहुंचे एक व्यक्ति ने एक लाख रुपए के बदले बच्ची देने की पेशकश की, जिसे उसने ठुकरा दिया।

संतोष के परिवार में पत्नी के अलावा छह बच्चे हैं। ललिता (18), रत्ना (14), राधिका (12), श्रवण (10), द्रोपदी (8) और कुनिका 14 माह की है। पति-पत्नी ने मिलकर बच्ची का नाम वनेश्वरी रखा है, क्योंकि वह जंगल में मिली। घर में बाकायदा पूजा कराई गई। संतोष का कहना है कि यह बच्ची देवीस्वरूप है। उसके आगमन के साथ घर पर सुख-शांति आ गई है। गांव में मजदूरी के एवज में उसे सालभर मे दो गाड़ा धान मिलता है।

खेतों में चर रहे एक मवेशी को उसके मालिक के घर पहुंचाने पर 12 रुपए या एक काठा धान मिलता है। गरीबी के बावजूद वह वनेश्री की परवरिश स्वयं करना चाहता है। वह उसे किसी अनाथ आश्रम में भी भर्ती नहीं कराना चाहता। उसका कहना है कि इस समय विद्युत कनेक्शन और बीपीएल राशन कार्ड की नितांत आवश्यकता है, ताकि बच्ची की परवरिश बेहतर ढंग से कर सके।

कहां से आई बच्ची
जिस पेड़ पर बच्ची मिली, वहां से करीब 100 कदम की दूरी पर दुगली जोन का मुख्य मार्ग है। संतोष का मानना है कि किसी अविवाहिता ने बच्ची को जन्म देने के बाद अपना कृत्य छिपाने के लिए उसे जंगल में छोड़ दिया होगा। नर्स ने बच्ची की नाल काटी और बताया कि उसके मिलने के दिन से करीब चार दिन पहले बच्ची जन्मी होगी।

क्या कहते हैं सरपंच पति
गांव की सरपंच निराशा साहू के पति निरंजन साहू का कहना है कि फिलहाल बच्ची के पालन पोषण के लिए किसी तरह की आर्थिक सहायता की योजना पंचायत के पास नहीं है।





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