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जुझारुपन की कमी से जूझते हम

दृष्टिकोण. madel ओलिंपिक के इतिहास में पहली बार किसी व्यक्तिगत स्पर्धा में भारतीय को स्वर्ण पदक मिला, परिणामत: सभी को खुशी हुई। कई राज्यों ने शूटिंग में स्वर्ण पाने वाले अभिनव बिंद्रा पर पैसों की बारिश कर दी और दो दिन तक अखबारों के पहले पन्ने पर बिंद्रा-स्तुति की गई। संयोग है कि इसी ओलिंपिक में एक नया इतिहास रचा गया।

अमेरिका के 23 वर्षीय माइकल फेल्प्स ने तैराकी में 8 स्वर्ण पदक जीतकर एक कीर्तिमान स्थापित किया। फेल्प्स ने एथेंस ओलिंपिक में भी 6 स्वर्ण और दो कांस्य पदक जीते थे। कई ऐसे छोटे-छोटे देश हैं जिनके खिलाड़ियों ने स्वर्ण पदक जीते हैं लेकिन भारत जैसे विशाल देश में एक स्वर्ण पदक हासिल किए जाने के बाद इतनी बड़ी चर्चा क्यों हो रही है?

21वीं सदी भारत और चीन की है, ऐसी गवरेक्ति करने वाले इस बात की तरफ बिलकुल ध्यान नहीं देते कि चीन अमेरिका के साथ स्पर्धा करके उससे ज्यादा स्वर्ण पदक हासिल कर सकता है और भारत सिर्फ एक स्वर्ण पदक से संतुष्ट हो जाता है। इस बात का रत्तीभर खेद उनको नहीं होता है। भारतीय अल्प खुशी में भी संतुष्ट रहते हैं। किसी भी क्षेत्र में तेजस्वी ढंग से और जुझारुपन के साथ दुनिया को मुट्ठी में करने की प्रवृत्ति भारतीयों में अंशमात्र भी दिखाई नहीं देती। किसी भी हालत में जीतने की बात भारतीयों को पचती नहीं।

क्रिकेट के खेल में दुनियाभर में अपनी धाक जमाने वाले कई खिलाड़ी भारत में हुए हैं, लेकिन भारतीय टीम का सबसे बड़ा पराक्रम कई बार ‘फालोऑन’ मिलने के बाद पारी की हार से बचने की कोशिश में देखने को मिला है। इसके विपरीत श्रीलंका जैसे छोटे देश की टीम ने हालिया क्रिकेट सिरीज में भारतीय महारथी खिलाड़ियों की कैसी फजीहत की है यह सभी ने देखा है।

अभी कुछ समय पहले बेंगलुरू और अहमदाबाद में आतंकियों ने श्रंखलाबद्ध विस्फोट किए। जिन परिवारों के सदस्य इन धमाकों में मारे गए या विकलांग हो गए, उन परिवारों में तीव्र क्रोध पैदा हुआ होगा। लेकिन उनका रोष, क्रोध कुछ ही समय का होता है। आतंकी घटनाओं के बाद गृहमंत्री गुजरात दौरे पर गए थे। कुछ समय बाद प्रधानमंत्री भी गए। उन्होंने गुजरात की जनता की शांति भंग नहीं होने देने की प्रशंसा की। राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ऐसी ही शाबासी दी।

आतंकवादी कौन हैं, उनके कर्ता-धर्ता कौन हैं, कहां छुपकर बैठते हैं, विस्फोट की सामग्री कहां छुपाते हैं, यह सबको पता है, लेकिन उसके बारे में बात करना खिलाफ है। इसके विपरीत आतंकवादियों के मार्फत उनके अनुपोषक भारत के खिलाफ ‘प्रॉक्सी वार’ चला रहे हैं। किसी भी तरह का प्रतिकार न करते हुए चुप बैठे रहने की प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है, इसका अध्ययन करने का समय आ गया है।

भारतीयों की लाचारी की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। आतंकी हमलों के बाद बदले की भावना से कुछ भी नहीं करना चाहिए, इस तरह के उपदेश राजनेता देते आ रहे हैं। यह बात सही भी है ऐसे समय में शांति स्थापित करने को प्राथमिकता मिलना चाहिए, लेकिन आज ऐसे उपदेशों को सभ्यता और शिष्टाचार माना जाता है।

जनता भी इन उपदेशों को स्वीकार कर अगली आतंकी घटना घटने का इंतजार करती है, लेकिन देश की चुनी हुई सरकार को यह भूमिका नहीं अपनाना चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह गुनहगारों को ढूंढ़ निकाले और उनको मदद करने वाले, सहारा देने वाले और विस्फोटक आदि सामग्री मुहैया कराने वालों को पकड़े, फिर उनको यथाशीघ्र सख्त से सख्त सजा दे।

आज भारतीय समाज में एक तरह की मानसिक शिथिलता आ गई है, बल्कि ऐसी ही निष्क्रियता सरकारों में भी मौजूद है। दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के बाद ऐसे कठोर निर्णय लेने वाला कोई राजनेता इस देश को नहीं मिला।

गांधी और उनके अनुयायियों के बारे में चर्चिल ने कहा था कि ‘इन लोगों की हैसियत कमजोर है और सरकार चलाना उसके बस में नहीं है।’ चर्चिल की उस समय की भविष्यवाणी आज सच हो रही है। कोई भी कठोर निर्णय लेने का समय आता है तो हमारे राजनेता पीछे हट जाते हैं। गांधीजी के आजादी आंदोलन में जो नेतृत्व उभरकर आया था वह हमेशा कमकूवत ही साबित हुआ।

मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी का आतंकवादियों ने अपहरण किया था, जिसे उनकी मांगों के सामने झुककर छुड़ाया गया। उस वक्त विश्वनाथ प्रतापसिंह प्रधानमंत्री थे। उस एक घटना से आतंकियों के हौसले बुलंद हुए और आतंकी घटनाएं बढ़ती गईं। कंधार विमान अपहरण में भी सरकार ने आतंकवादियों के सामने घुटने टेके। उस समय केंद्र में अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार थी। भारतीय जनता पार्टी के लोग आदर्शवाद की बातें करते हैं, लेकिन समय आने पर वे भी कमजोर बन जाते हैं।

इस कमजोरी की कीमत उनको 2004 के चुनावों में भुगतना पड़ी। वैसे देखा जाए तो ‘तेजस्वी भारत’ यह घोषणा बड़ी ही क्रांतिकारी थी। किसी ने उसका अंग्रेजी रूपांतर ‘इंडिया शाइनिंग’ किया, जिसका मतलब होता है ‘ऊपरी चमक वाला भारत’ न कि ‘तेजस्वी भारत।’ कंधार प्रकरण से देश की जनता का विश्वास भाजपा से उठ गया। उसकी घोषणाओं को लोगों ने दरकिनार कर दिया, जिससे उसकी नैया डूब गई।

खेल का मैदान हो या रोजमर्रा के कार्य हों, भारतीय समाज शिथिलता से ग्रस्त हो गया है। आज इस देश का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में चला गया है जो संकट की घड़ी में हमेशा घुटने टेकते आए हैं। पिछले 15 वर्षो में डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या की लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। इनसे सरकार पसीजी नहीं बल्कि उसने ऐसी कारगुजारियां की हैं कि किसानों को उत्पादों के कम भाव मिले, उनका घाटा बढ़ता जाए, उनके कर्ज बढ़ें और फलस्वरूप वे आत्महत्याएं करें। सरकार की किसानों के संदर्भ में जो भी नीति है उससे किसान कभी भी लाभान्वित नहीं होंगे। मजबूरन किसानों की आत्महत्याएं जारी रहेंगी।

एक ऐसा समय था जब भारत एक ‘तेजस्वी भारत’ था। यहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया बसेरा करती थीं। उसी देश में आज यह शिथिलता कहां से आई और उसके कारण क्या हैं? इन सवालों के जवाब ढूंढ़ने चाहिए।
-लेखक राज्यसभा सदस्य और शेतकरी संगठन के संस्थापक हैं।





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