संपादकीय. जब हमारे वित्तमंत्री पी. चिदंबरम कुछ माह पहले दुनिया को समझा रहे थे कि अनाज की बढ़ती कीमतों के पीछे असली खलनायक कच्चे तेल का वायदा कारोबार है, तब उनकी मंशा निश्चित तौर पर इससे ध्यान बंटाने की नहीं थी।
अब जैसे ही कच्च तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में 105.46 डॉलर प्रति बैरल पर आया है, भारतीय शेयर बाजार कुलांचे भरता हुआ 15,000 के पार जा पहुंचा है। कच्चे तेल ने पिछले साल भारतीय अर्थव्यवस्था को सबसे कठिन दौर में ला खड़ा किया था। जहां लग रहा था कि कीमतों पर सरकार का कोई काबू नहीं रह गया है।
बेशक सरकार ने विश्व बाजार की तेजी का सीधा भार पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर नहीं डाला, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को गेहूं, चावल, खाद्य तेलों जैसी वस्तुओं की कीमतों पर काबू करने में काफी मशक्कत करना पड़ी।
अमेरिका का बायो डीजल उत्पादन जहां मक्का, गेहूं व अन्य अनाजों की कीमतें बढ़ा रहा था, वहीं मलेशिया व इंडोनेशिया में पाम तेल की कीमतों में आग लगी रही। अपनी जरूरत का करीब आधा खाद्य तेल आयात करने वाले भारत जैसे देशों के लिए इसका आयात करना भी मुश्किल हो गया था। सरकार ने जब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा किया तो परिवहन लागत ने महंगाई को हर सप्ताह रिकॉर्ड तोड़ने वाला बना दिया।
बहरहाल कच्चे तेल की न्यूयॉर्क मर्केटाइल एक्सचेंज में अक्टूबर वायदा की कीमतें 105.46 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं, जो 29 अगस्त के मुकाबले करीब 9 फीसदी कम हैं। दुनियाभर के कमोडिटी बाजारों में जबर्दस्त गिरावट देखी जा रही है, फिर भी खतरा पूरी तरह से टला नहीं है।
विश्व बैंक ने दुनिया की विकास दर 3.7 फीसदी के मुकाबले घटकर 2.7 फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुमान भी 8 फीसदी से नीचे चले गए हैं। हालांकि अब भी ब्याज दरें काफी ऊंची हैं और कई क्षेत्रों में अमेरिकी मंदी का असर साफ दिखाई दे रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में कमी का असर पूरी दुनिया में मुद्रास्फीति पर दिखाई देगा। यूरो जोन में ही मुद्रास्फीति 4 फीसदी से घटकर 3.8 फीसदी पर आ गई है। भारत में भी पिछले दो सप्ताह से मुद्रास्फीति थमी सी दिखाई दे रही है। ऐसे में कच्चे तेल में गिरावट अंतरराष्ट्रीय अनाज बाजार में जिंसों की कीमतों में भी कमी ला सकती है।