सभी देवी-देवता कल्याणकारी हैं इसीलिए पूज्य हैं, लेकिन गणेश इसमें प्रथमपूज्य क्यों हैं? इसका उत्तर उनके परम आकर्षक स्वरूप में ही मिलता है। उनका स्वरूप निगरुण ओंकार का ही सगुण साकार रूप है अर्थात ओंकार परमसत्ता की आवाज है।
यही ओंकार आत्मा के रूप में हमारे भीतर हमेशा गूंजता है। हमारे बाहर भी ओंकार है जो हमारे ही द्वारा बनाई गई ध्वनियों के कारण सुनाई नहीं देता लेकिन जब वह गणोश प्रतिमाओं के रूप में हमें दिखाई देता है तब हमारे भीतर का भाव सीधे गणोश से जुड़ जाता है।
गणेश पंच महाभूतों में जल के देवता हैं इसीलिए जल की भांति धरती से आकाश तक, आदि से अंत और अनंत तक उनकी सत्ता व व्यापकता है। यही कारण है कि वे जननायक और गणनायक हैं। चूंकि अन्य देवताओं के स्वरूप एकदम सीधे-सीधे हमारे अस्तित्व की ध्वनि, हमारे भीतर के ओंकार, हमारी आत्मा के नाद से सौ फीसदी मेल नहीं खाते, इसीलिए वे हमसे जुड़कर भी हमारी अभिव्यक्ति नहीं बन पाते।
कदाचित गणेश की पूजा सबसे पहले किए जाने की प्राचीन परंपरा के मूल में ओंकार है। मनुष्य के भीतर की मूल ध्वनि और परमसत्ता का वह नाद, गणोश जिसके सेतु बन जाते हैं। शास्त्रों में गणेश का अद्भुत स्वरूप चित्रित किया गया है। वे ‘गणपति देव एकदंत और चतुर्बाहु हैं।
वे अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, दंत और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिह्न् है। वे रक्तवर्ण लंबोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्र धारक हैं। रक्त चंदन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पों द्वारा सुपूजित हैं।’ ऐसे ही गणोश, शिव और शक्ति के पुत्र होकर परमदिव्य, परम कल्याणमय और परमशक्तिवान भी हैं।
सारा जगत शिवमय माना गया है, लेकिन शिव को भी शक्ति के बगैर शव की संज्ञा दी गई है। गणेश इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे शिव और शक्ति दोनों के गुणों और शक्तियों से संपन्न हैं। इसीलिए गणोश प्रथमपूज्य हैं।
उनका पूरा व्यक्तित्व विरोधाभासों का पर्याय है। उनका हर अंग, हर मुद्रा और उसके प्रतीक जीवन में प्रबंधन की अनूठी कला को सिखाने वाले हैं। उनका विशाल गजमुख और वाहन के रूप में चूहा परम विरोधाभास का प्रतीक है जो उनके अर्थात गणेश के रूप में संदेश देता है। उनके चार हाथ हैं। दो हाथों में पाश और अंकुश है। पाश मोह का और तमोगुण का प्रतीक है और अंकुश प्रकृति और रजोगुण का चिह्न्। पाश से वे भक्तों के मोह रूपी शत्रु को फांसते हैं और अंकुश से नियंत्रित करते हैं।
यहां जब गणेश अंकुश धारण करते हैं तो संकेत देते हैं कि हम बुद्धि संपन्न तो हों, लेकिन खुद पर नियंत्रण भी हो। गणोश सिखाते हैं कि प्राप्ति के साथ नियंत्रण भी सीखें। अन्य दो हाथ वर और अभय की मुद्रा में है। वर देने का आशय है अपनी सकारात्मकता का सतत प्रसार और अभय का आशय है समाज की सकारात्मकता का संरक्षण। इसीलिए गणोश बुद्धि के साथ मंगल के देवता भी माने गए हैं।
वे रिद्धि-सिद्धि के पति हैं। ये नाम वस्तुत: प्रतीकात्मक हैं। इनका संदेश यह है कि गणोश यदि मंगल करते हैं तो उनकी उपस्थिति में स्वयं रिद्धि अर्थात ऐश्वर्य और सिद्धि अर्थात हर काम को दक्षता से करने का गुण/सामथ्र्य हमें स्वत: ही मिल जाता है।
उनके पुत्र लाभ और क्षेम हैं, इसका आशय यही है कि यदि हम सकारात्मकता से भरे हैं तो लाभ मिलता है और क्षेम का अर्थ यह है कि जो लाभ मिलता है वह सुरक्षित भी रहता है अर्थात गणेश न सिर्फ हमें मोह रूपी बंधन से मुक्त करते हैं , बल्कि उन पर नियंत्रण भी सिखाते हैं। उनकी मोदक प्रियता वस्तुत: आनंदप्रियता है। वह सिर्फ एक लड्डू नहीं है बल्कि समाज की मिठास को स्वीकार करने और उसको पचा जाने का भी प्रतीक है।
उनके विशालकाय शरीर पर पुता सिंदूर सौभाग्य का सूचक माना गया है और उनका एकदंत एकता का पर्याय है। उन्हें अर्पित किए जाने वाले लाल फूल भी मंगल के प्रतीक हैं तो दुर्वा विनम्र होने का संकेत देती है।
कहते हैं गणेश ने महाभारत की रचना के लिए अपना एक दांत खंडित कर उसकी कलम बना ली थी। वेदव्यास जो कहते गए, गणोश उसे तत्काल लिखते गए। इस अर्थ में गणेश दुनिया के पहले आशुलिपिक हैं जिन्होंने शीघ्रता से वर्तनी दोषरहित महाभारत की रचना में महती योगदान देकर साहित्य और सृजन के प्रति भी अपनी भूमिका सिद्ध की और यह बताया कि सकारात्मकता के साथ समर्पण और सृजन अनिवार्य है।
गणेश चतुर्थी पर गणेश के जन्म का उत्सव महज एक लोकाचार या धार्मिक परंपराभर नहीं है। वास्तव में यह एक संकल्प धारण करने का दिन है कि हम अपने भीतर के ओंकार को सुनने का प्रयास करेंगे ताकि हमारे बाहर और भीतर गणोश घटे क्योंकि उनके घटने का अर्थ है समाज में मंगल होना और हर तरफ उल्लास के साथ आनंद का साम्राज्य होना।