उदयपुर. राजस्थान और मध्यप्रदेश समेत देश के कुछ हिस्सों में श्री गणेश के नारी स्वरूपों की भी पूजा की जाती है। जयपुर के पास रेड़ में ईसा पूर्व पहली सदी की नारी गणेश की प्रतिमा को प्राचीनतम माना गया है।
हर्षदेव मंदिर की 10वीं सदी की गणेशी (नारी गणेश) प्रतिमाएं भी उत्कृष्ट हैं, लेकिन इन सबमें मेवाड़ के बिजौलिया के पास मंदाकिनी के मंदिरों की दो गणेशी प्रतिमाएं अपने आपमें अद्वितीय उदाहरण हैं। ये दो प्रतिमाएं करीब 13वीं सदी की हैं।
मेवाड़ की सीमा पर हिंगलाजगढ़ (मंदसौर) में भी नारी गणेश की मूर्ति मिली है। कुछ मूर्तियां मध्यप्रदेश के भेड़ाघाट-जबलपुर और उड़ीसा के चौसठ योगिनी मंदिरों से मिली हैं। गजानना (नारी गणेश) भगवान गणेश की शक्ति रही है। विष्णु की शक्ति वैष्णवी, शिव की शिवा, ब्रम्हा की ब्रम्हाणी शक्ति की तरह ही इसे भी एक शक्ति माना गया है। हिंदू, जैन, बौद्धों में मान्य : इस देवी का वर्णन केवल हिंदू पुराणों और मंत्र शास्त्रों में ही नहीं बल्कि बौद्ध और जैन शास्त्रों में भी मिलता है।
कैसी है नारी स्वरूपा गणेश की प्रतिमा : गोरखनाथ ने तो इसकी मूर्ति का स्वरूप भी तय किया है। ‘गोरखसंहिता’ के पहले खंड के सातवें अध्याय में लिखा है कि गणेशी की प्रतिमा नीली आभा वाली, नील वर्णा, नीललोहित और पिंगला होने के साथ गजमुखी, महाकाया, तीन आंखों वाली, उज्ज्वल मुकुट वाली हो। लंबे उदर वाली, स्थूल देह, चारभुजाओं में आयुध लिए हो। वाम भाग में लड्डू, दांत और दक्षिण भाग में फरसा व सूत्र हो। चूहे की पीठ पर सवार और सभी गहनों से सजी-धजी हो।
अनेक नाम : नारी गणेश को गजानना, हस्तिनी, वैनायिकी, विघ्नेश्वरी, गणोशी, गणोश्वरी, गणपतिहृदया, श्रीअयंगिनी, महोदरा, गजवक्त्रा, लंबोदरा, महाकाया आदि नामों से भी जाना जाता है।