वाशिंगटन/वियना.
भारत को परमाणु व्यापार संबंधी छूट देने पर विचार के लिए गुरुवार को शुरू हो रही एनएसजी की दो दिवसीय बैठक के ठीक पहले करार को लेकर अमेरिका में हुए खुलासे ने धमाका कर दिया है।
इसके मुताबिक भारत ने यदि परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका न सिर्फ परमाणु ईंधन की आपूर्ति रोक देगा, बल्कि परमाणु सहयोग ही खत्म कर देगा। यह भारत की यूपीए सरकार के दावे के एकदम विपरीत है।
भारत-अमेरिकी करार के कुछ महत्वपूर्ण उपबंधों पर अमेरिकी स्थिति को स्पष्ट करने वाले अमेरिकी विदेश विभाग के दस्तावेज परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह (एनएसजी) की बैठक के ठीक पहले मंगलवार को सार्वजनिक किए गए हैं। इसमें करार को लेकर अमेरिकी स्थिति भारत द्वारा की गई व्याख्या से अलग नजर आती है।
दरअसल, 26 पेज का यह दस्तावेज विदेश मामलों संबंधी कांग्रेस की स्थाई समिति के अध्यक्ष व करार विरोधी हावर्ड बरमैन ने सार्वजनिक किया है। इसमें करार को लेकर पूछे गए 45 सवालों पर जॉर्ज बुश प्रशासन के जवाब शामिल हैं। ये सवाल बरमैन के पूर्ववर्ती दिवंगत टॉम लैंटोस ने अक्टूबर में पूछे थे और बुश प्रशासन ने 16 जनवरी को इसका जवाब दिया था। तब भारत में करार को लेकर राजनीतिक विवाद के चलते अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने समिति से आग्रह किया था कि वे इसे सार्वजनिक न करें।
इस खुलासे के बाद गुरुवार से शुरू हो रही एनएसजी की दो दिवसीय बैठक में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रिया जैसे एनएसजी के सदस्य देश भारत को दी जाने वाली छूट में ऐसी ही शर्ते शामिल करने पर जोर दे सकते हैं।
बुश प्रशासन ने यह कहा है दस्तावेज में :
* परमाणु ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित रखने के आश्वासन का अर्थ भारत को परमाणु परीक्षण के परिणामों से बचाना नहीं है।
* ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करने से आशय मात्र इतना था कि व्यापारिक स्पर्धा के कारण यदि कोई देश आपूर्ति रोकता है, तो अमेरिका उसे सुनिश्चित करेगा।
* भारत ने यदि परणामु परीक्षण किया तो अमेरिका करार खत्म कर देगा, ईंधन आपूर्ति रोक देगा और दिए गए परमाणु आयटम व सामग्री वापस मांग लेगा।
* हाइड एक्ट के तहत कुछ परिस्थितियों में संवेदनशील परमाणु प्रौद्योगिकी हस्तांतरित की जा सकती है, लेकिन करार के बाहर जाकर ऐसा करने का बुश प्रशासन का कोई इरादा नहीं है।
* संवेदनशील प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और इसके लिए आवश्यक महत्वपूर्ण उपकरण मुहैया कराने के लिए करार में संशोधन का कोई इरादा नहीं है।
‘इस दस्तावेज में ऐसी कोई नई शर्त नहीं है, जिस पर खुले और पारदर्शी तरीके से अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों व भारत सरकार के साथ चर्चा नहीं हुई है।’
- डेविड मलफोर्ड, भारत में अमेरिका के राजदूत (नई दिल्ली में)
‘भारत सिर्फ अमेरिका के साथ हुए करार की शर्तो के अनुसार चलेगा। परीक्षण को लेकर हमारे रुख में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। हम अपनी नीति के तहत अन्य सरकारों की विभिन्न शाखाओं के बीच हुए लिखित व्यवहार पर टिप्पणी नहीं करते।’
- नवतेज सरना, प्रवक्ता, भारतीय विदेश मंत्रालय (नई दिल्ली में)
‘मैंने दस्तावेज संबंधी बयान पढ़ा है, लेकिन मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। मैं कल और उसके बाद भी कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।’
- प्रणब मुखर्जी, विदेशमंत्री (नई दिल्ली में, बार-बार टिप्पणी मांगने पर)
विपक्ष का हल्ला बोल
एटमी करार पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के खुलासे से मनमोहन सिंह सरकार का पर्दाफाश हो गया है और इस मामले पर उसका रुख सही साबित हुआ है। गलत बयानी पर प्रधानमंत्री तत्काल इस्तीफा दें।
-यशवंत सिन्हा, भाजपा उपाध्यक्ष
करार पर हमारा रुख सही साबित हुआ। सरकार को राष्ट्र विरोधी एटमी करार को अमल में लाने के सारे कदम रोक देना चाहिए।
-माकपा पोलित ब्यूरो, (एक बयान में)
सरकार ने संसद और देश की जनता को गुमराह किया है।
-डी. राजा, भाकपा नेता
भारत की जनता के साथ किए इस बड़े छलावे में भारत सरकार शामिल है, जिसे अमेरिका के बुश प्रशासन ने तैयार किया था।
-प्रकाश करात, माकपा महासचिव
यह परमाणु परीक्षण का अधिकार होने के प्रधानमंत्री के वादे के विपरीत है। हम इसीलिए करार का शुरू से विरोध कर रहे थे।
-सीताराम येचुरी, माकपा नेता (हैदराबाद में)
अमेरिकी कांग्रेस व बुश प्रशासन के बीच हुए सवाल-जवाब का कोई महत्व नहीं है। हम तो बुश और मनमोहन सिंह के संयुक्त बयान से बंधे हैं।
-वीरप्पा मोइली, कांग्रेस प्रवक्ता