संपादकीय. ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि किसी निजी कारखाने के समर्थन और विरोध में किया जा रहा आंदोलन समाज के इतने अधिक वर्गो को प्रभावित करे, पर पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा समूह की नैनो कार के कारखाने का मामला अब और उलझता नजर आ रहा है।
तृणमूल कांग्रेस के इसी कारखाने के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन के चलते कारखाने में काम कई दिनों से ठप पड़ा है। अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि टाटा समूह इस कारखाने को अन्यत्र स्थानांतरित कर सकता है। मुकेश अंबानी और सौरव गांगुली समेत कई हस्तियों ने इस कारखाने का पक्ष लिया है तो सपा अब ममता के साथ खड़ी है।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के दोनों ओर की लगभग सभी पार्टियों में उद्योग लगाने के प्रति एकराय है। यहां तक कि वैचारिक रूप से पूंजीवाद विरोधी वामदल भी बड़े उद्योगों को न्योता दे रहे हैं। ऐसे में एक बार वैधानिक रूप से मंजूरी मिल जाने के बाद किसी उद्योग के खिलाफ आंदोलन चलाने की सार्थकता पर सवाल जरूर उठते हैं।
सिंगूर में जमीन अधिग्रहण के समय और कारखाने लगाने के प्रारंभिक दिनों में ही तृणमूल कांग्रेस और अन्य प्रभावित पक्षों के साथ बैठकर अतिरिक्त जमीन के मामले को सुलझाया जा सकता था। अब, जब इस कारखाने से निकलने वाली कार का दुनिया को इंतजार है और इसे भारतीय उद्योग जगत और विशेषकर पश्चिम बंगाल के औद्योगिक परिदृश्य के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है, तब इसके उत्पादन में देर होना या स्थगित होना पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि पूरे देश के उद्योग जगत के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
सवाल इस बात का नहीं है कि यह आंदोलन राजनीति से प्रेरित है या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि उद्योग लगाए जाने जैसे महत्वपूर्ण नीतिगत मामलों पर आमराय बनाना क्यों संभव नहीं? ऐसा क्यों है कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद किसी आंदोलन या कानूनी दांव-पेंच के चलते किसी उद्योग को पीछे हटना पड़े या उसे शुरू करने में अड़चन आए?
देश में आधारभूत ढांचा या अन्य सार्वजनिक संस्थानों का निर्माण भी अक्सर ऐसे ही कानूनी या राजनीतिक आंदोलनों से प्रभावित होता रहता है। प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा देने और पर्यावरण संबंधी अन्य शर्तो को सर्वसम्मति से पूरा करके ऐसे उपक्रमों को बिना किसी अड़चन से बनाए जाने में देश का विकास और प्रगति निर्भर है। कितना अच्छा हो कि समाज के सभी वर्ग इस धारणा को समझें।