bhaskar Web English
HomeVichaar Vichaar

बेनकाब हो गए अमेरिकी इरादे

छींका भी टूटा तो किस वक्त? अगले 24 घंटों में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यह फैसला करने वाला है कि भारत-अमेरिकी परमाणु-सौदे पर वह मुहर लगाए या न लगाए। इसी मौके पर वाशिंगटन डी.सी. में वह दस्तावेज उजागर हो गया है, जिसने मनमोहन सिंह सरकार की नींद हराम कर दी है।

यह दस्तावेज गोपनीय नहीं था लेकिन पिछले आठ माह से उसे दबाकर रखा गया था। अमेरिकी सरकार के एक अधिकारी ने अपने सांसद टॉप लेंटोस को 26 पृष्ठ का पत्र लिखकर उन सब शंकाओं का समाधान किया था, जो परमाणु सौदे को लेकर अमेरिका में उठ रही थीं। पत्र पढ़कर लेंटोस चुप हो गए। फरवरी 2008 में उनका निधन हो गया। अब उनकी जगह अंतरराष्ट्रीय मामलों की समिति के नए अध्यक्ष बने हावर्ड बरमैन ने इस पत्र को उजागर कर दिया।

इस लंबे पत्र में दो बातें बहुत विवादास्पद हैं। एक तो यह कि यदि भारत ने कोई परमाणु परीक्षण कर दिया तो सौदा तत्काल भंग हो जाएगा और दूसरी यह कि उसे मिल रही परमाणर्ु ईधन की सप्लाई भी तुरंत रोक दी जाएगी।

ये दोनों बातें इस सौदे की कमर तोड़ देती हैं, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री पूरे देश और संसद को यह समझाते रहे हैं कि परमाणु परीक्षण की पहले तो नौबत ही नहीं आएगी, क्योंकि हमने स्वेच्छा से प्रतिबंध घोषित कर रखा है। अगर नौबत आई भी तो भारत को मिलने वाला परमाणर्ु ईधन उसे सदा मिलता रहेगा तथा सौदा भंग करने के पहले अमेरिकी सरकार बातचीत करेगी, हमारी मजबूरी को समझने की कोशिश करेगी और अमेरिकी राष्ट्रपति चाहेंगे तो भारत को छूट भी दे सकेंगे।

प्रधानमंत्री का ऐसा कहना गलत नहीं है, क्योंकि ‘समझौते 123’ में इस आशय को स्पष्ट लिखा गया है। लेकिन सिरदर्द तब पैदा होता है, जब हम गहरे उतरते हैं या बारीकियों में जाते हैं। लेंटोस को लिखे गए पत्र ने अमेरिकी सरकार के असली इरादों को बेनकाब कर दिया है।

मनमोहन सरकार का दोष यह है कि वह इन खतरनाक इरादों को पहचानने में असमर्थ रही। हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अमेरिका के परमाणु शास्त्र का सही अर्थ नहीं समझ पाए। उन्होंने परमाणर्ु ईधन की सप्लाई के बारे में यह समझ लिया कि वह अविकल और अनंत है, जबकि लेंटोस का पत्र साफ-साफ कहता है कि यदि परमाणु-बाजार की किसी गड़बड़ी के कारण भारत की सप्लाई बंद होती है, तो अमेरिकी उसे जारी रखेगा।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत कोई परमाणु परीक्षण करे या परमाणु प्रसार करे तो भी यह सप्लाई जारी रहेगी। यह ठीक है कि ‘समझौते 123’ में परीक्षण शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ है लेकिन इस भारत-अमेरिकी समझौते को अमेरिकी ‘हाइड एक्ट’ के साथ रखकर पढ़ा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका भारत के हाथ-पांव बांधना चाहता है।

अमेरिका भारत को वे परमाणु तकनीकें भी नहीं देगा, जिनका दोहरा (फौजी और गैर फौजी) इस्तेमाल हो सकता है। भारत ने जिस परमाणु-अप्रसार संधि का जी-जान से विरोध किया है, उस पर हस्ताक्षर किए बिना ही आज भारत उसका हस्ताक्षरकर्ता बनने जा रहा है।

भारतीय विदेश मंत्रालय का यह कहना हास्यास्पद है कि वह केवल ‘समझौता 123’ को मान्यता देता है और उसका ‘हाइड एक्ट’ से कुछ लेना-देना नहीं है। यदि अमेरिका का आंतरिक कानून इतना कमजोर होता तो ‘लीग ऑफ नेशंस’ और ‘सीटीबीटी’ की विश्व प्रसिद्ध संधियां कूड़े की टोकरी के हवाले क्यों हो जातीं?

किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि के मुकाबले राष्ट्रीय कानून कहीं बड़ा होता है। हमारे विदेश मंत्री का बयान भी विचित्र है कि वे अमेरिकी सरकार और लेंटोस के पत्र-व्यवहार पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे, क्योंकि यह उनका आंतरिक मामला है। वह आंतरिक तो है लेकिन मामला क्या है? मामला तो भारत का है। आप टिप्पणी करें या न करें, उसका असर तो भारत पर पड़े बिना नहीं रहेगा।

यदि वह पत्र इतना कम महत्वपूर्ण है तो उच्च स्तरीय आपात बैठक क्यों बुलाई गई? असलियत तो यह है कि इस पत्र ने भारत सरकार की बोलती बंद कर दी है। अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने जले पर नमक छिड़क दिया है।

उन्होंने कहा कि इस पत्र में नया कुछ नहीं है। भारत सरकार को यह सब पहले ही बता दिया गया था। मलफोर्ड ने भारत के विपक्षी नेताओं के तरकश में एक साथ कई तीर भर दिए हैं। अपने कम्युनिस्ट साथियों को भारत सरकार ने पूरी बात कभी नहीं बताई, इसका कारण क्या यही है कि वे दस्तावेजों की लकीरों में छिपे हुए जहरीले शब्दों को भी सूंघ पा रहे थे। उनकी शंकाएं अब सही साबित हो रही हैं।

भारत सरकार को सबसे ज्यादा परेशानी अब वियना में भुगतनी पड़ेगी। एनएसजी के 45 देश कहेंगे कि अमेरिका ने जो शर्त्े रखी हैं, हम भी वे ही शर्त्े रखेंगे। हम भारत को विशेष छूट क्यों दें। हमारे विदेश मंत्री यहां तक झुक गए कि उन्होंने ‘बिना शर्त पूरी छूट’ की मांग से ‘पूरी’ पर जोर देना छोड़ दिया है।

कोई आश्चर्य नहीं है कि उन 45 देशों पर अमेरिका उसी साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग करे, जो उसने भारत पर किया है। यदि भारत जैसे सबसे बड़े लोकतंत्र और गुट-निरपेक्ष राष्ट्र के घुटने टिकवाए जा सकते हैं तो यूरोप के छोटे-मोटे जिलानुमा राष्ट्रों की क्या बिसात है?

भारत एनएसजी में से तो बच निकलेगा, ऐसा लग रहा है, उसमें आखिरकार कौन ठगा जाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। अमेरिका भारत पर परमाणु-अप्रसार थोपना चाहता है और भारत गैर-फौजी परमाणु-सहकार की ओट में छठी परमाणु महाशक्ति बनना चाहता है। मनमोहन सिंह जैसा सीधा-सरल आदमी कैसा टेढ़ा खेल खेल रहा है? कहीं भारत को लेने के देने न पड़ जाएं?

अमेरिका के विदेश उपमंत्री विलियम बर्न्‍स ने पत्रकारों से कहा, ‘अमेरिका का दृढ़ विश्वास है कि भारत के लिए जिन उपायों पर हम विचार कर रहे हैं, उनसे परमाणु अप्रसार को मजबूती मिलेगी। इनसे दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक तथा सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के वैश्विक परिदृश्य में शामिल होने में मदद मिलेगी। मेरा मानना है कि वे इस प्रक्रिया में निरंतर प्रगति कर रहे हैं और हम प्रगति करना जारी रखेंगे।’

इस महत्वपूर्ण बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर बर्न्‍स ने बताया कि कुछ देशों ने ‘महत्वपूर्ण सवालों पर विचार करने की जरूरत’ बताई है।

फिर भी संतुष्ट नहीं:

न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रिया, आयरलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देश संशोधित मसौदे से भी संतुष्ट नहीं हैं। इस मसौदे के अनुसार एनएसजी प्रमुख इस बात की नियमित जानकारी रखेंगे कि दुनिया से परमाणु व्यापार करने के दौरान भारत एनएसजी के दिशा-निर्देशों का पालन कर रहा है या नहीं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड:
 

आपके विचार
Amit
Friday, 5th Sep 2008, 12:01
This government want to sell the country to America, Plz publish the same as much as possible. Congress should not rule any more and PM should immidiatly resign. Its very shame full if they can't see and convey the hidden thing to the nation regarding the deal
umesh kumar
Sunday, 7th Sep 2008, 8:45
यह सब ठीक नहीं हो रहा है