भोपाल.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट www.mohfw. nic.in पर 35 बीमारियों के इलाज में उपयुक्त ड्रग्स की जानकारी गाइडलाइन्स में दी गई है। इसका मकसद मरीजों को इलाज के नाम पर ज्यादा कीमत वाली दवा न लेने के प्रति जागरूक बनाना है। साथ ही उन्हें इस बात के लिए भी सजग किया जा रहा है कि कोई केमिस्ट डॉक्टर की लिखी दवाइयों को बदल न सके।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की इस स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइडलाइन्स ने प्रदेश के मेडिकल खेमे में हलचल पैदा कर दी है। स्वास्थ्य संगठनों की लंबे समय से चल रही लगातार मांग और दबाव के बाद एक माह पहले ही इसे लागू किया गया है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस गाइडलाइन्स को कानूनी जामा भी पहनाया जा सकता है।
इसके चलते वे तमाम मेडिकल प्रेक्टिशनर्स घेरे में आ जाएंगे जो निजी दवा कंपनियों के हित में मरीजों पर दवा थोपते रहते हैं। मरीज जानकारी के अभाव में इन कंपनियों की दवाइयां खाने को मजबूर होता है। मरीज अब अपने इलाज की तुलना गाइडलाइन्स से करेंगे और गलत होने पर कानूनी कार्रवाई के वक्त यह गाइडलाइन्स उनकी मददगार होगी। फिलहाल इसे एक्ट में घेरे में नहीं डाला गया है इसलिए इसके खिलाफ जाने वाले डॉक्टर्स पर अपराध नहीं बनता जब तक कि मरीज कोर्ट की शरण में न जाए।
कानूनी जामा पहनाने की जरूरत
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व उपाध्य्क्ष डॉ. भरत छापरवाल मानते हैं कि यह गाइडलाइन्स मरीजों के हित में पहला कदम है लेकिन बेहतर व्यवस्था तब कायम होगी जब केंद्रीय मंत्रालय इसे कानूनी जामा पहनाएगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बाजारवाद के बढ़ते दबाव में जब पूरा समाज है तो डॉक्टर उससे अछूते हैं। कई बार इस दबाव में मरीज का इलाज होता है।
स्वास्थ्य सेवाओं में कार्य कर रहे जन स्वास्थ्य संगठन के अजय खरे का मानना है कि हेल्थ मिनिस्ट्रिी ने यह गाइडलाइन्स जारी कर मरीजों के अधिकारों को सुनिश्चित किया है। अब प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह इसे प्रदेश में लागू करे। आज हो यह रहा है कि सरकारी अस्पतालों में जो थोकबंद दवा खरीदी हुई है उससे मरीजों इलाज हो रहा है, वहीं प्राइवेट अस्पतालो में मरीज डॉक्टर की मनमानी से दबे हुए हैं।
इनके लिए जारी हुई है गाइडलाइन्स
एमिबायसिस, कॉलेरा, डेंगू, बुखार, टाइफाइड, मलेरिया, कैंसर, डायबीटिज, स्त्री रोग, हार्ट डीसिस, एनेमिक, आंखों, दांतों की बीमारी, मानसिक रोग, सिजोफ्रेनिया, शराब के कारण होने वाली बीमारियां, एड्स आदि के लिए गाइडलाइन्स बनाई गई है।
प्रभावी तरीके से लागू हो
मप्र मेडिकल काउंसिल के रजिस्ट्रार डॉ. राघवेंद्र गुमाश्ता ने बताया कि ऐसी कई शिकायतें काउंसिल के पास आती हैं जिसमें डॉक्टर के खिलाफ आरोप होता है कि उसने गलत इलाज किया है। काउंसिल इसकी पूरी जांच करती है, कई बार मामले झूठ निकलते हैं और कई बार डॉक्टर्स के खिलाफ पेनल्टी भी की जाती है। मंत्रालय ने अब अगर गाइडलाइन्स जारी की है तो इसे प्रभावी तरीके से लागू की जाना चाहिए।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष इलेक्ट डॉ. सीपी कोठारी ने डीबी स्टार से कहा कि यहां बाजारवाद का कोई रोल नहीं है। गाइडलाइन्स हमारे देश के लिए नया मामला है। यह गाइडलाइन क्वालिफाइड डॉक्टर्स की मदद के लिए ही है। हमने मरीज का इलाज स्टेंडर्ड गाइडलाइन्स के अनुरूप किया है तो यह न्यायालयीन विवाद होने पर डॉक्टर के लिए मजबूत पक्ष होता है।
पिंपल्स
सीमा चेहरे पर होने वाले पिंपल्स से परेशान थी। उसने एक प्रतिष्ठित स्किन क्लिनिक का सहारा लिया, जहां पर स्किन स्पेशलिस्ट ने उसका इलाज किया और उसकी जानकारी के बिना उसे कार्टिजोन क्रीम और दवा दी। जिसका असर यह हुआ कि वह आज पिंपल्स से ज्यादा चेहरे पर उगने वाले बालों से त्रस्त है।
जुकाम
शिवाजी नगर निवासी मनोरमा श्रीवास्तव अपने बच्चे को लगातार होने वाले सर्दी-जुकाम से त्रस्त थीं। जनरल प्रेक्टिशनर से इलाज करवाया, हर सप्ताह साठ रुपए की दवा तीन महीने दी, कुछ खास असर नहीं हुआ। पता चला लोकल ब्रांड की दवा क्लिनिक से देकर डॉक्टर ने उसके बच्चे को अस्थमा की समस्या तक पहुंचा दिया है।
डिप्रेशन
स्नेहा स्कूल की टॉपर थी, पुणो कॉलेज में सिलेक्शन होने के बाद वह भोपाल से गई, माहौल बदलने से वह भावनात्मक समस्या से घिर गई। पढ़ाई में एकाग्र नहीं हो पा रही थी। माता पिता साइकेट्रिस्ट के पास लेकर गए। जिसने भारी भरकम दवा दी लगभग 20 दिन दवा खाने के बाद थाइराइड हो गया और तीन महीने में वजन 20 किलो बढ़ गया।
बुखार
प्रॉपर्टी का काम कर रहे वसीम खान बुखार आने पर क्रोसिन की दवा लेने केमिस्ट के पास गए उसने क्रोसिन के नाम पर कोलसिन थमा दी। असर यह हुआ कि बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा। उनका कहना है सरकार मरीजों के हक में केमिस्ट को भी सही दवा देने के लिए बाध्य करे, तभी गाइडलाइन्स बेहतर साबित होगी।