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यहां आते ही बन जाते हैं अंगद..

भोपाल.प्रदेश के लाखों बच्चों का भविष्य बने या न बने, इससे न शासन को सरोकार है और शिक्षा विभाग को। प्राचार्य व व्याख्याताओं की कमी है लेकिन सैकड़ों प्राचार्यो और व्याख्याताओं को भोपाल में मनचाही नियुक्ति मिली है।

शिक्षा विभाग और माध्यमिक शिक्षा मंडल के अधीन आने वाले लगभग दो दर्जन विभागों में सैकड़ों प्रतिनियुक्तियां हैं, जिनमें से अधिकांश नियम कायदों से परे लंबे समय से यहां जमे हैं। उदाहरण बतौर माध्यमिक शिक्षा मंडल के उस विभाग के कर्मचारियों को लिया है, जो दो साल पहले बंद हो चुका है लेकिन कर्मचारियों को वापस नहीं भेजा गया। यह लगभग हर विभाग की कहानी है।

मामला माध्यमिक शिक्षा मंडल के एकेडेमिक सेक्शन का है। 1965 में यह विभाग पत्राचार पाठ्यक्रम के लिए शुरू हुआ था। उस समय इंटरमीडिएट होता था और बड़ी संख्या में विद्यार्थी पत्राचार से ही पढ़ाई करते थे। उनका पाठ्यक्रम बनाने और अन्य कार्यो के लिए माध्यमिक शिक्षा मंडल का एकेडेमिक सेक्शन बनाया गया। इसमें अलग-अलग विषयों के लगभग 45 शिक्षक पदस्थ किए गए थे। पत्राचार करने वाले विद्यार्थियों की घटती संख्या के मद्देनजर सरकार ने इस काम के लिए नए शिक्षकों की भर्ती नहीं की।

उधर, 1986 से हाई स्कूल और हायर सेकंडरी स्कूल व्यवस्था शुरू हुई तो पत्राचार का पाठ्यक्रम डिजाइन करने के लिए कुछ शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर बुला लिया गया। 2006 तक इसी तरह काम चलता रहा। इसके बाद पत्राचार पाठ्यक्रम तो बंद कर दिया गया लेकिन इस सेक्शन को एकेडेमिक सेक्शन बनाकर प्रतिनियुक्ति पर व्याख्याताओं और प्राचार्यो को यहीं पर रखा गया। यही नहीं उनका आना अभी भी जारी है।

शिक्षा विभाग और माध्यमिक शिक्षा मंडल के अधीन आने वाले लगभग दो दर्जन विभागों में सैकड़ों प्रतिनियुक्तियां हैं, जिनमें से अधिकांश नियम कायदों से परे लंबे समय से यहां जमे हैं। उदाहरण बतौर माध्यमिक शिक्षा मंडल के उस विभाग के कर्मचारियों को लिया है, जो दो साल पहले बंद हो चुका है लेकिन कर्मचारियों को वापस नहीं भेजा गया। यह लगभग हर विभाग की कहानी है।

मामला माध्यमिक शिक्षा मंडल के एकेडेमिक सेक्शन का है। 1965 में यह विभाग पत्राचार पाठ्यक्रम के लिए शुरू हुआ था। उस समय इंटरमीडिएट होता था और बड़ी संख्या में विद्यार्थी पत्राचार से ही पढ़ाई करते थे। उनका पाठ्यक्रम बनाने और अन्य कार्यो के लिए माध्यमिक शिक्षा मंडल का एकेडेमिक सेक्शन बनाया गया। इसमें अलग-अलग विषयों के लगभग 45 शिक्षक पदस्थ किए गए थे। पत्राचार करने वाले विद्यार्थियों की घटती संख्या के मद्देनजर सरकार ने इस काम के लिए नए शिक्षकों की भर्ती नहीं की।

उधर, 1986 से हाई स्कूल और हायर सेकंडरी स्कूल व्यवस्था शुरू हुई तो पत्राचार का पाठ्यक्रम डिजाइन करने के लिए कुछ शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर बुला लिया गया। 2006 तक इसी तरह काम चलता रहा। इसके बाद पत्राचार पाठ्यक्रम तो बंद कर दिया गया लेकिन इस सेक्शन को एकेडेमिक सेक्शन बनाकर प्रतिनियुक्ति पर व्याख्याताओं और प्राचार्यो को यहीं पर रखा गया। यही नहीं उनका आना अभी भी जारी है।

इन आठों पर यह आरोप

>> पाठ्यक्रम के नाम पर कम्पाइलेशन का काम।>> वर्कशॉप में आने वाले शिक्षकों से भुगतान पर काम।

>> एक विषय में तीन-तीन और दो-दो लोगों को रखा गया है। जबकि अन्य अनेक विषय में कोई नहीं है।

>> प्रति 80 रुपए प्रति पेज लिखने वाले शिक्षक को और 20 रुपए प्रति पेज टाइपिंग के लिए दिया जा रहा है। यह अतिरिक्त खर्च है।

>> बतौर प्रचार्य प्रमोशन के बाद भी नहीं जा रहे हैं।

>> एक-एक प्रतिनियुक्ति के लिए 60 हजार से एक लाख रुपए। (चयन प्रक्रिया में खुलापन नहीं होने से इस आरोप को बल मिलता है।)

चयन प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े हैं

>> जो योग्यता इन शिक्षकों के पास है क्या प्रदेश में उससे योग्य या समकक्ष कोई नहीं है?

>> बोर्ड को पाठ्यक्रम डिजाइन करने और प्रशिक्षण के लिए यदि फील्ड में ही कार्यरत प्राचार्य और व्याख्याताओं की जरूरत है तो हर दो साल में नए शिक्षकों को मौका क्यों नहीं दिया जाता?

>> प्रतिनियुक्ति अधिकारियों की पसंद पर ही क्यों की जाती है? प्रदेश के दूर दराज इलाकों में पदस्थ सैकड़ों योग्य शिक्षकों को यदि बोर्ड के अधिकारी नहीं जानते हैं तो क्या उन्हें राजधानी में रहकर काम करने का मौका नहीं दिया जाएगा।

>> प्रतिनियुक्ति पर चयन के लिए सरकार आवेदन के आधार पर चयन क्यों करती है। प्रदेशभर के शिक्षकों के लिए खुला साक्षात्कार क्यों नहीं होता है जिससे इच्छुक शिक्षक इसमें भाग ले सकें? ताकि सबसे योग्य शिक्षकों को ही मौका मिले।

इन नियमों का भी उल्लंघन

ठ्ठ चार साल से ज्यादा किसी भी कर्मचारी को प्रतिनियुक्ति पर नहीं रखा जा सकता है। पदोन्नति के बाद मूल संस्था में पदभार संभालना जरूरी है।

यहां भी हैं सैलानी

राज्य शिक्षा केंद्र 18

लोक शिक्षण संचानालय 60

राज्य ओपन स्कूल 10

पाठ्यपुस्तक निगम 3

भोज यूनिवर्सिटी 5

मंडी बोर्ड 2

स्वास्थ्य शिक्षा 3

संस्कृत बोर्ड 14

व्यापमं 1

स्कूल शिक्षा मंत्रालय 1

मॉडल स्कूल, डीपीसी, माखनलाल पत्रकारिता वि.वि., विकासखंड शिक्षा अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में भी बड़ी संख्या में प्रतिनियुक्ति पर लोग हैं।

१ मुकेश शर्मा

भौतिकी शास्त्र में व्याख्याता। प्रतिनियुक्ति पर छह साल हो गए। अब विज्ञान प्रशिक्षण केंद्र में पदस्थ।

उनका तर्क आवेदन दिया था। मेरे पास योग्यता है मेरी सेवा से शायद शासन ज्यादा खुश है इसलिए 6 साल से पदस्थ हूं।

२ ललितकुमार तिवारीसंस्कृत में व्याख्याता। 14 दिसंबर 04 को प्रतिनियुक्त पर आए थे। 26 दिसंबर 07 को उन्हें प्राचार्य बनाया।

उनका तर्क

३ डॉ. डीएस परमार

जीव विज्ञान में व्याख्याता। 14 फरवरी 05 में प्रतिनियुक्ति पर आए। 20 साल से भोपाल में ही पदस्थ हैं।लेखक के रूप में काम देखकर सरकार ने डिमांड की। अब सरकार भेजेगी तो हम चले जाएंगे।

उनका तर्क मेरी छवि पूरे विभाग में अलग है। मैंने वह किया है जो शासन में कोई नहीं कर पाया। मैंने आवेदन नहीं दिया।

४ रामसनेही शर्मा

गणित में प्राचार्य। 12 सितंबर 06 को प्रतिनियुक्ति पर आए। अब विज्ञान प्रशिक्षण केंद्र का प्रभारी पद पर।

उनका तर्क

आवेदन दिया था कि मैं आना चाहता हूं तो बोर्ड ने विचार किया। बोर्ड के कर्मचारी बेहतर परिणाम नहीं दे पाते।

आशुतोष दुबे

अंग्रेजी में उच्च श्रेणी शिक्षक। 07 में ही आए। उनकी जगह सुजाता श्रीवास्तव को सीहोर भेज दिया गया।

उनका तर्क

मैं आगे बढ़ना चाहता था और मेरी योग्यता थी। इसलिए आवेदन किया। अंग्रेजी का मेरे अलावा विशेषज्ञ नहीं।





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