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नो कंस्ट्रक्शन जोन में सेंध

जोधपुर. वायुसेना के लड़ाकू विमानों की फ्लाइट सेफ्टी के लिए जोधपुर एयरफोर्स स्टेशन के 100 एवं 900 मीटर दायरे में घोषित ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ में भू-कारोबारियों ने सेंध लगा दी है।

राष्ट्रीय हित में नगर विकास न्यास के जिन अफसरों पर यह स्टेटस बनाए रखने का जिम्मा है, वे ही सुरक्षा में सेंध लगाने की अनुमति दे रहे हैं। न्यास की तामीर इजाजत शाखा को तो अब तक यह पता ही नहीं था कि ऐसे किसी जोन में निर्माण की अनुमति देने पर रोक है।

रक्षा मंत्रालय ने 14 फरवरी 2007 को नए सिरे से अधिसूचना जारी करते हुए देश के सभी एयरफोर्स स्टेशन के 100 एवं 900 मीटर के दायरे में आने वाले क्षेत्र को ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ घोषित कर दिया था। इससे पहले एयरफोर्स से लगते समूचे 900 मीटर के दायरे में किसी तरह के निर्माण पर रोक थी, लेकिन इस अधिसूचना की अवधि 2002 में समाप्त हो गई थी।

नई अधिसूचना में नो कंस्ट्रक्शन जोन के लिहाज से जोधपुर एयरफोर्स स्टेशन के दायरे को 100 मीटर एवं 900 मीटर में विभाजित किया गया है। रक्षा मंत्रालय के आदेश पर जिला प्रशासन ने एयरफोर्स की मदद से 2006 में ही इस जोन में आने वाली भूमि का विस्तृत सर्वे पूरा करवा लिया था। यहां तक कि 22 नवंबर 2006 को जिला प्रशासन, न्यास व निगम, रक्षा संपदा अधिकारी तथा एयरफोर्स के अफसरों ने संयुक्त रूप से 100 मीटर एवं 900 मीटर से प्रभावित होने वाले गांवों के खसरों की सूची भी तैयार कर ली, ताकि प्रस्तावित अधिसूचना को देखते हुए तत्काल प्रभाव से इन इलाकों को फ्लाइट सेफ्टी के लिए निर्माण जैसी बाधा से मुक्त रखा जा सके।

फाइल से गायब हुआ ले-आउट!
‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ में पट्टे और भवन निर्माण अनुमति देने के लिए न्यास में किसी भी हद तक गोलमाल हो सकती है। एक बड़ी टाउनशिप को फायदा पहुंचाने का ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है। इसमें प्रतिबंधित क्षेत्र में आने वाले क्षेत्र को चिह्न्ति करने वाला ले-आउट प्लान ही फाइल से गायब करवा दिया गया है। इसकी जगह एक नया ले-आउट प्लान फाइल में शामिल किया गया है।

भिचड़ली के खसरा नं-4 / 36 एवं 4/ 47 में स्थापित की जा रही इस टाउनशिप के लिए वरिष्ठ नगर नियोजक ने 237.70 बीघा भूमि का ले-आउट 2 मार्च 2006 को स्वीकृत किया था। इस अवधि में नो कंस्ट्रक्शन जोन की अधिसूचना अस्तित्व में नहीं थी, लिहाजा सुविधा क्षेत्रों का आनुपातिक प्रतिशत देखते हुए ले-आउट अनुमोदित हो गया।

इस बीच, नई अधिसूचना प्रभावी होने से संकट खड़ा हो गया। टाउनशिप मालिकों के पट्टे जारी करवाने के आवेदन को देखते हुए पूर्व सचिव कृष्ण कुणाल ने पटवारी से निर्माण निषिद्ध क्षेत्र को ले-आउट पर अंकित करवा दिया। यह रिपोर्ट 14 दिसंबर 2007 को सचिव के सम्मुख पेश भी हो गई, जिसके मुताबिक इस टाउनशिप का एक हिस्सा 100 मीटर व दूसरा हिस्सा बमडम से 900 मीटर के दायरे में आता है।

इनमें से 900 मीटर में करीब साठ बीघा हिस्सा प्रतिबंधित क्षेत्र में आ रहा था, जिसमें विभिन्न साइजों के करीब दो सौ प्लॉट एवं एक बड़ा हाउसिंग ग्रुप व कॉमर्शियल प्लॉट पड़ता है। ले-आउट पर लाल लाइन से इस जोन को अंकित करने के बाद पूर्व सचिव ने 15 दिसंबर 07 को नोटशीट पर उप नगर नियोजक को यह निर्देश दिए कि इसी आधार पर ले-आउट संशोधित किया जाए।

यह ले-आउट संशोधित होने से पहले ही फाइल से गायब हो गया। इसकी जांच किए बिना ही टाउनशिप मालिक के पत्र पर कुछ अरसे पहले तहसीलदार व दूसरे पटवारी ने यह टिप्पणी भी अंकित कर दी कि इस टाउनशिप का कोई हिस्सा 900 मीटर में नहीं आता। न्यास के पटवारियों की ही विरोधाभासी टिप्पणियों से यह मामला सुर्खियों में है।

दरअसल, इस मामले का मुख्य पेच यह है कि एयरफोर्स स्टेशन के चारों ओर नो कंस्ट्रक्शन जोन के संयुक्त नक्शे के हिसाब से तो यह क्षेत्र 900 मीटर में आ रहा है, लेकिन तैयार किए गए खसरों की संख्या में इसका 900 मीटर में उल्लेख नहीं है। रक्षा संपदा अधिकारी ने भी इसी आधार पर न्यास के विशेषाधिकारी (भूमि) को एक पत्र दिया है, जिसके आधार पर अब फाइल वरिष्ठ नगर नियोजक के पास लंबित है।

नो कंस्ट्रक्शन जोन में पट्टे व भवन निर्माण इजाजत जारी नहीं हो सकती। यह गंभीर मामला है कि इस तरह की अनुमतियां जारी हुई हैं। अब ऐसी व्यवस्था की जा रही है कि तामीर इजाजत शाखा भी ऐसे प्रकरणों पर निगरानी रखे, ताकि ऐसी कोई अनुमति जारी न हो सके। ऐसे मामलों को सूचीबद्ध किया जाकर निर्माण रुकवाने की कार्रवाई की जाएगी।
—अनिल माथुर, उप नगर नियोक, यूआईटी

कागजी साबित हुआ प्रतिबंध
2006 में सर्वे और फरवरी 2007 में नो कंस्ट्रक्शन जोन की अधिसूचना के बावजूद न्यास के अफसरों ने इसकी परवाह नहीं की। बासनी बेंदा के खसरा नं-25 में न्यास ने ऐसी ही कारगुजारी अंजाम दी है। यह पूरा खसरा इस जोन के 900 मीटर के दायरे में है, लेकिन अधिसूचना जारी होने के बाद न्यास ने न केवल मार्च 2007 को यहां आवासीय प्रयोजनार्थ पट्टे जारी किए, बल्कि गुपचुप तरीके से इन प्लॉटों पर मकान बनाने की अनुमति भी जारी कर दी।

‘भास्कर’ ने एक ऐसे ही पट्टे की जांच की तो पता लगा कि श्यामसिंह सजाड़ा एंड संस के नाम से जारी यह पट्टा 22 मार्च 2007 को जारी हुआ था। इसके साथ ही खसरा नं-25 के अन्य पट्टे भी जारी हुए। इनमें से प्लॉट नं-23 के पट्टे पर न्यास ने 7 मार्च 2007 को भवन निर्माण अनुमति भी दे दी।

न्यास की तामीर इजाजत शाखा के रिकॉर्ड के हिसाब से इस खसरे के अन्य पट्टों पर भी भवन निर्माण अनुमतियां दी गई हैं। ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ का स्टेटस बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि भूमि का मौजूदा लैंड-यूज नहीं बदला जाए। ऐसे में अधिसूचना के बाद पट्टे जारी करना तो नियम-विरुद्ध है ही, भवन निर्माण की अनुमति भी वर्जित है।

इसके विपरीत न्यास की तामीर इजाजत शाखा के पास अब तक ऐसे किसी जोन की अधिकृत जानकारी ही नहीं है, जिसके आधार पर वे भवन निर्माण अनुमति रोक सकें। तामीर इजाजत के लिए भी फाइलें इंजीनियरिंग शाखा में जाती है।

पटवारी या तहसीलदार की रिपोर्ट ली ही नहीं जाती। ऐसे में इस जोन की सुरक्षा में न्यास का लचर सिस्टम ही सबसे बड़ा सुराख बना हुआ है। भास्कर की पड़ताल के दौरान उप नगर नियोजक के सामने जब यह मामला आया तो उन्होंने भविष्य में नो कंस्ट्रक्शन जोन की रिपोर्ट लेने की व्यवस्था बनाने का भरोसा दिलाया है।





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