इंदौर. पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) का संदेह है थाने पहुंचने वाले के साथ अच्छा व्यवहार हो और रिपोर्ट भी लिखी जाए। टीआई एमआईजी ने ऐसा किया तो थाने का घेराव हुआ और एसपी साहब ने उन्हें लाइन अटैच कर दिया।
इसके बाद भी क्या कोई पुलिसकर्मी सहज ही एफआईआर लिखने को तैयार हो पाएगा? जवाब निश्चित ही नहीं में होगा और आम आदमी की तो फजीहत तय ही है।
एमआईजी थाने पर हुए राजनीतिक ड्रामे और टीआई के लाइन अटैच होने के बाद पुलिस और जनता के संबंधों को लेकर नए सिरे से बहस होने लगी है। मौजूदा पुलिस प्रमुख संतोष कुमार राउत ने प्रभार संभालते ही थानों की दशा सुधारने और वहां पहुंचने वालों के साथ अच्छा व्यवहार कर शिकायत दर्ज करने को प्राथमिकता बताया था।
वैसे भी एफआईआर यानी फस्र्ट इन्फरमेशन रिपोर्ट (प्राथमिकी) के आधार पर पुलिस जांच कर आरोपी का पता लगाती है। तब मामला कोर्ट में जाता है। जांच में मामला झूठा निकले तो भारतीय दंड संहिता की धारा 182 व 211 और मामले के अनुरूप अन्य धाराओं का इस्तेमाल कर झूठी शिकायत करने वाले को ही सजा दिला सकती है। हालांकि व्यवहार में ऐसा होता नहीं क्योंकि आमतौर पर पुलिस प्राथमिक जांच के बाद एफआईआर करती है जबकि होना उलटा चाहिए।
एसपी का भी प्रभाव नहीं
नेताओं द्वारा पुलिस को बेइज्जत करने का खामियाजा जनता ही भुगतती है। इसका सबूत है हर दिन एसपी ऑफिस में देख सकते हैं। वहां दर्जनों ऐसे लोग पहुंचते हैं जिनकी थाने में रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। एसपी आवेदन पर टीप लिखते हैं तब रिपोर्ट हो पाती है। रसूखदारों से जुड़ी शिकायतों में तो टीप भी असर नहीं डालती और शिकायत करने वाला समझौते को मजबूर हो जाता है।
नेता-पुलिस खींचतान भी वजह
थाने पहुंचने वालों से बेहतर व्यवहार हो और रिपोर्ट तत्काल हो जाए, इसके प्रयास पुलिस अफसर तो करते रहे हैं लेकिन रिपोर्ट न हो पाए इसके लिए भी तगड़ी राजनीतिक लॉबिंग होती है। कई बार तो पुलिस को पीछे हटना पड़ता है। ताजा मामला एमआईजी थाने का ही है। इससे पहले 18 मई को भाजयुमो नेता अजीत रघुवंशी ने पार्टी के लोगों के साथ तुकोगंज थाने का घेराव कर पुलिस को जलील किया था। कारण था कॉम्बिंग गश्त में कागजात न मिलने पर एक कार्यकर्ता की गाड़ी जब्त करना। एडीशनल एसपी के सामने किशोर उम्र के कार्यकर्ताओं ने टीआई से अभद्रता की। इससे तुकोगंज पुलिस का मनोबल इतना गिरा कि चेकिंग में सख्ती बंद हो गई।
पुलिस डराती है
कुछ मामलों में पुलिसकर्मी ही आरोपी की महिमा मंडित कर शिकायत करने वाले को डराते हैं। इसका उदाहरण है छत्रीपुरा का चंदा प्रकरण। वहां चंदाखोरों ने व्यापारियों को पीटा और थाने पहुंच गए। वहां भी उन्हें धमकाया। पुलिस ने पीड़ित व्यापारियों का मेडिकल कराया और रिपोर्ट न कराने का दबाव भी बनाया। अगले दिन अफसरों के दबाव में एफआईआर लिखी गई।
राजनीतिक दबाव कुछ नहीं होता, पुलिस अधिकारी में अपना दम होना चाहिए। टीआई राणावत ने अगर पार्षद के विरुद्ध मुकदमा कायम कर ही लिया था तो गिरफ्तार भी कर लेना था। हम हर हाल में उनका साथ देते, लेकिन बाद में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका पर उन्हें कुछ समय के लिए लाइन अटैच का निर्णय लिया गया। पुलिस अधिकारी किसी प्रकार के दबाव में न आकर पूरी कार्रवाई करें। सिस्टम उनका साथ देगा। आम जनता की सुनवाई हर हाल में होगी।
- एसके राउत, डीजीपी