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जन्मदिन, भविष्यफल और अंधविश्वास

परदे के पीछे.आज ६ सितंबर को राकेश रोशन के जन्मदिन के साथ ही स्वर्गीय यश जौहर का भी जन्मदिन है अर्थात एक घर में पार्टी तो दूसरे घर में प्रार्थना की जाएगी। राकेश रोशन और यश जौहर ने ताउम्र संघर्ष किया और दोनों ही के भाग्य लगभग साथ ही जागे।

राकेश रोशन ने फिल्म निर्माण अपने अभिनय कैरियर के आरंभ होने के कुछ वर्ष पश्चात ही प्रारंभ कर दिया था परंतु उन्हें पहली भव्य सफलता शाहरुख-सलमान अभिनीत ‘करण-अजरुन’ से मिली और यश जौहर को पहली सफलता अमिताभ-शत्रुघ्न अभिनीत ‘दोस्ताना’ में मिली परंतु बाद में बनाई सारी फिल्में असफल रहीं।

यहां तक कि अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘अग्निपथ’ भी नहीं चली। हालांकि उनके सुपुत्र करण जौहर की ‘कुछ कुछ होता है’ सचमुच में भव्य सफलता रही।

एक ही जन्मदिन वाले राकेश रोशन और यश जौहर के इकलौते पुत्रों रितिक तथा करण उनके लिए अकल्पनीय समृद्धि लेकर आए। विगत समय में अनेक क्षेत्रों में समृद्धि की इस तरह की कहानियां घटित हो रही हैं। जैसे छोटे शहर के धोनी, जहीर, इरफान इत्यादि लोगों को क्रिकेट ने करोड़पति बना दिया है। यह भी देख रहे हैं कि ‘दीवार’ की एक साइड में धूप है और दूसरी तरफ अंधेरा है। इतनी भयावह आर्थिक खाई केवल भारत में देखने को मिलती है।

गौरतलब यह है कि समृद्धि प्राप्त करने वालों के अंधविश्वास हैं तो समृद्धि के लिए लालायित लोग भी टोने-टोटकों में यकीन करते हैं। विगत दशक में बैंक में धना जमा करते वालों से दो गुनी संख्या आश्रमों, मंदिरों, मस्जिदों में देखी जा सकती हैं। कुछ धार्मिक ट्रस्टों के पास बैंकों से अधिक राशि जमा होती है।

मनुष्य विकास के प्रारंभ से ही अंधविश्वास की भी शुरूआत हुई है और यह माना जाता रहा है कि शिक्षित होते ही अंधविश्वास से मुक्ति मिल जाती है। परंतु इस दौर में शिक्षित लोग भी अंधविश्वास के शिकार हैं। यही अंतर डराने वाला है और शिक्षित लोग भी कट्टर धार्मिक होकर अन्य धर्मो के प्रति असहिष्णु होते जा रहे हैं। इतिहास के किसी दौर में ऐसा नहीं हुआ है। समाज शास्त्र में यह गहरे शोध का विषय है कि कुछ क्षेत्रों और व्यक्तियों तक सीमित समृद्धि अंधविश्वास को पुख्ता करती है।

अकल्पनीय आय प्राप्त होते ही मनुष्य को लगता है कि यह उसका परिश्रम या प्रतिभा के फल के अलावा ईश्वर का आशीर्वाद भी है। इस अहसास के जागते ही धन्यवाद देने की भावना अंधविश्वास और अनुष्ठानों से जुड़ जाती है। शतक बनाते समय पहनी हुई अंडरवियर को हीरे की तरह संभालकर रखा जाता है। यह भी अजीब बात है कि समृद्धि की ही तरह प्रेम में लोग अंधविश्वासी हो जाते हैं।

राधा ने कृष्ण के जाने के बाद उनसे मिलन के समय के वस्त्रों को कभी धोया नहीं और जतन से सहेजकर रखा। दरअसल समृद्धि व्यक्ति के सामाजिक दायित्व भी बढ़ना चाहिए और उसका व्यवहार दूसरों के लिए उदाहरण बनना चाहिए। श्रद्धा की ज्योत से ज्योत जितनी जलती है, उससे अधिक तेजी से अंधविश्वास का अंधकार फैलता है।





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DHARMENDER YADAV
Saturday, 6th Sep 2008, 13:13
I WANT KNOW ABOUT MY ASTRO .
Manas Ranjan Sahoo
Saturday, 6th Sep 2008, 17:00
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