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कानूनी पेंच में जरदारी का दांव

दृष्टिकोण. pak पाकिस्तान में आज होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से आगे देखना बेहद जरूरी है। 18 अगस्त को परवेज मुशर्रफ के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद पीपीपी- पीएमएल (एन) गठबंधन की साझेदारी की मुख्य वजह भी अब खत्म हो चुकी है।

इसके ठीक एक हफ्ते बाद 25 अगस्त को पीएमएल (एन) के अध्यक्ष नवाज शरीफ केंद्र में गठबंधन से अलग हो गए। दोनों पार्टियों ने राष्ट्रपति पद के लिए अपने-अपने उम्मीदवार खड़े किए। जहां पीपीपी ने अपने सह-अध्यक्ष आसिफ अली जरदारी को उम्मीदवार बनाया, वहीं पीएमएल (एन) ने पाकिस्तान के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश सईदुज्जमां सिद्दीकी को पार्टी की ओर से नामांकित किया, जिसके बाद विभाजन खुलकर सामने आ गया।

इस वक्त पाकिस्तान के समक्ष गंभीर संवैधानिक चुनौतियां हैं। आखिर राष्ट्रपति की शक्तियां क्या होंगी? जरदारी ने कहा कि यह ज्यादातर ‘औपचारिक’ होगा और वे राष्ट्रपति के नेशनल एसेंबली को भंग करने के अधिकार को समाप्त कर देंगे। संसदीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति के अधिकार निश्चित तौर पर महज औपचारिक नहीं होना चाहिए।

1973 के संविधान ने पाकिस्तान में राष्ट्रपति की शक्तियों को बिलकुल सीमित करते हुए प्रधानमंत्री को शक्तिशाली बना दिया, लेकिन 1985 में हुए आठवें संविधान संशोधन से स्थिति पलट गई और इसने राष्ट्रपति को मनमाने तरीके से प्रधानमंत्री को पदच्युत करने और नेशनल एसेंबली को भंग करने का अधिकार दे दिया। वैसे आमतौर सभी संसदीय लोकतंत्र द्वारा मध्य मार्ग अपनाया जाता है, जिसमें उसे स्वविवेक के आधार पर सीमित शक्तियां दी गई हैं। वह न तो मात्र रबर स्टांप होता है और न ही सर्वशक्तिमान। वह तो एक अंपायर की भूमिका निभाता है और अकसर संकट के दौरान। ज्यादातर देशों में प्रधानमंत्री और कैबिनेट ही शासन-व्यवस्था चलाते हैं।

इन शक्तियों को परिभाषित करने के लिए इसके त्रासद इतिहास को देखना होगा, जो 1973,1985 और 1997 में संविधान संशोधन के जरिए की र्गई। 1985 में किए गए आठवें संशोधन को 1997 में तेरहवें संशोधन के जरिए रद्द करके राष्ट्रपति के अधिकार को दोबारा सीमित कर दिया गया।

सवाल यह है कि क्या जरदारी के अधिकार सीमित करने संबंधी बयान पर यकीन किया जा सकता है? वे तीन बार अपनी ही बात से मुकर चुके हैं। दो बार जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा बर्खास्त किए गए जजों को बहाल करने और एक बार राष्ट्रपति चुनाव के लिए राष्ट्रीय स्तर के किसी नेता के नाम पर।

नवंबर 1993 से फरवरी 1997 तक बेनजीर भुट्टो के सत्ता में रहने के दौरान जरदारी ‘मिस्टर टेन परसेंट’ के रूप में कुख्यात थे। भुट्टो और जरदारी दोनों को दो अलग-अलग मामलों में उनके जेनेवा में अधिवक्ता जांस शेगेलमिश (जिसे उन्होंने आगे कर रखा था) के साथ स्विस अदालतों ने आरोपी बनाया। उन्होंने वर्जिन आइलैंड में वोमर फाइनेंस के नाम से एक फर्जी कंपनी बना रखी थी। एक मामला काली कमाई को वैध बनाने से संबंधित था, जबकि दूसरा सीधे-सीधे रिश्वत लेने का। दोनों मामलों में शेगेलमिश और वर्जिन आइलैंड की कपंनियों का नाम शामिल था।

1990 के शुरुआत में जब बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री थीं, तब कॉटेक्ना कंपनी ने पाकिस्तान के साथ कस्टम्स की निगरानी और पर्यवेक्षण का अनुबंध किया था। इसने पाकिस्तान द्वारा भुगतान की गई धनराशि का 6 फीसदी जेनेवा में बर्कले बैंक (स्विस) में जमा कर दिया। यह खाता मेरिस्टन के नाम पर था जो ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड की कंपनी थी और जिसका स्वामित्व नुसरत भुट्टो के नाम पर था, लेकिन एक समझौते के तहत नुसरत की ओर से शेगेलमिश ने अपने नाम से मेरिस्टन के शेयर ले रखे थे। अनुबंध के लागू होने पर कोटेक्ना कंपनी द्वारा 1,200,000 डॉलर से ज्यादा रकम मेरिस्टन को दी गई। 1991 के आखिर में यह अनुबंध खत्म कर दिया गया।

6 अगस्त 1990 को राष्ट्रपति द्वारा बेनजीर भुट्टो को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया जिसके बाद नवाज शरीफ सत्ता में आए, लेकिन नवाज भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और उनकी बर्खास्तगी के बाद बेनजीर दोबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हरुई। बेनजीर की सत्ता में वापसी से कोंटेक्ना कंपनी का खुश होना स्वाभाविक था। इसके बाद कांटेक्ना कंपनी की विरोधी एक और स्विस फर्म इस परिदृश्य में आई। सोसाइट जनरल द’ सर्वेलेंस- एसजीएस का मुख्य काम था अपने ग्राहक की ओर से सेवाओं या सौदों का सत्यापन, पर्यवेक्षण या अभिप्रमाणन।

जून 1994 तक इसने अपनी पूर्व विरोधी कांटेक्ना कंपनी के सारे शेयर अर्जित कर लिए। 29 जून 1994 को शेगेलमिश को संबोधित करते हुए तीन पत्र लिखे, जिनमें लिखा गया था- ‘क्या हमें आज से छह महीने के भीतर का सरकार से अपने मुल्क में आयात होने वाले माल की जांच और मूल्य सत्यापन का अनुबंध मिल सकता है। हम इस अनुबंध की पूरी अवधि और इसके नवीनीकरण पर बीजक की कुल राशि और पाकिस्तान सरकार द्वारा हमें दिए जाने वाले राशि पर कमीशन देंगे।’

निर्णय में कहा गया- ‘24 मई 1995 को एसजीएस द्वारा पहली बार कमीशन देने के समय मेरिस्टन सिक्युरिटीस कंपनी, जिसे शुरुआत में बिल की राशि पर छह फीसदी कमीशन दिया जाना था’ की जगह बोमर फाइनेंस कंपनी आ गई, जो वर्जिन आइलैंड में बनी थी। मिस्टर जेंस शेगेलमिश इसके एकमात्र निदेशक/अध्यक्ष हैं। बोमर कंपनी के प्रबंधन का जिम्मा आसिफ अली जरदारी ने शेगेलमिश को सौंपा है।’

पूछताछ के दौरान शेगेलमिश ने माना कि उन्हें आसिफ अली जरदारी से निर्देश मिला था कि यदि किसी सूरत में उनकी मौत हो जाती है तो रकम को उनके और उनकी बीवी के परिजनों में बांट दिया जाए। जेनेवा की अदालत में इसी तरह के एक और मामले में इंवेस्टीगेटिंग मजिस्ट्रेट ने हुक्म दिया कि जेनेवा बैंक में वर्जिन आइलैंड की एक फर्म दार्गल एसोसिएट्स में जमा रकम को पाकिस्तान में ट्रांसफर की जाए। दार्गल 1994 में बनी।

शेगेलमिश और उनके साझेदार डिडियर प्लांटिन इसके प्रतिनिधि थे। उन्होंने आमेर लोधी को लाभग्राही स्वामी बनाते हुए उसके साथ दिसंबर 1994 में बैंक में खाता खोला। उसने इससे इंकार किया, वह मलीहा लोधी का भाई है। यह काला धन को वैध बनाने का मामला था, जिसमें बेनजीर और जरदारी को दोषी पाया गया। स्विट्जरलैंड में इस केस की कार्यवाही अभी खत्म नहीं हुई है। यदि जरदारी राष्ट्रपति चुन लिए जाते हैं तो फिर उन पर जो आरोप हैं, जो मुकदमे हैं, उसका क्या होगा?
-लेखक वरिष्ठ कानूनविद हैं।





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