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संवेदनहीनता की बाढ़

संपादकीय. कोसी के कहर से बदहाल उत्तरी बिहार के बाढ़ पीड़ितों की पीड़ा को महसूस करने के लिए राजनीतिज्ञों से जिस संवेदनशीलता की अपेक्षा बिहार की बदहाल जनता को थी, जिस पैमाने पर राहत की जरूरत थी, उसके स्थान पर वहां घोर संवेदनहीन और शर्मनाक राजनीति का दौर शुरू हो गया है।

स्थिति यह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय रेलमंत्री लालूप्रसाद यादव के बीच राहत कार्यो और बाढ़ की वजह से विस्थापित लोगों के पुनर्वास को लेकर तू-तू मैं-मैं अपने चरम पर पहुंच चुकी है। चारों ओर जल-प्रलय के बाद हुई इस भीषण तबाही के बीच मृतकों के परिवारों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वे दाह-संस्कार आखिर कहां और कैसे करें? जल-प्रलय के कारण न कहीं सूखी लकड़ी उपलब्ध है और न कहीं सूखी जमीन।

नतीजतन मृतकों के बदहाल परिजन बाढ़ के कारण मरे अपने प्रियजनों की लाश को बाढ़ की धारा में ही बहाने को मजबूर हैं। उन बदनसीब लोगों का और भी बुरा हाल है, जिनके परिजन बाढ़ में बह गए और उनका कोई अता-पता नहीं है।

बाढ़ से दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा है और लगभग दस लाख से अधिक मवेशी प्रभावित हुए हैं, सवा चार लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बाढ़ का पानी जमा हुआ है। लगभग आठ लाख लोगों को बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों से निकालकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया है, मगर ऐसे लोगों की संख्या वहां ज्यादा है, जो अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए राहत शिविरों में नहीं जाना चाहते। वहां खाली घरों में लुटेरे जमकर लूटपाट मचा रहे हैं और राहत कार्यो में लगी राज्य सरकार राहत शिविरों में रह रहे लोगों की संपत्ति की सुरक्षा की कोई गारंटी देने से बच रही है।

हालांकि राज्य सरकार अपनी ओर से 256 राहत शिविर और 116 स्वास्थ्य शिविर भी चला रही है, जिनमें लगभग ढाई लाख लोग रह रहे हैं यानी अब भी साढ़े तैंतीस लाख लोग सरकारी राहत कार्य के दायरे से बाहर हैं। वहां से खबरें आ रही हैं कि रमजान के इस महीने में इफ्तार के लिए मुसलमान बाढ़ पीड़ितों को खिचड़ी भी नसीब नहीं हो पा रही है।

जहां-जहां से पानी घटने की खबरें आ रही हैं, वहां बड़े पैमाने पर महामारी फैलने की जो आशंका व्यक्त की जा रही है, जिससे निबटने की न तो कारगर कोशिश की जा रही है और न ही बदहाली से जो कुछ बचा-खुचा है, उसको लुटने से बचाने के लिए सरकार के पास कोई सक्रिय कारगर तंत्र है।





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