जयपुर. हिन्दू समाज में व्यक्ति की मृत्यु के बाद शरीर का कर्मकांड के अनुसार अंतिम संस्कार अनिवार्य माना गया है, लेकिन पिछले कुछ सालों में देहदान की प्रवृत्ति ने प्राचीन समय से चले आ रहे इस मिथक को तोड़ा है। इसमें डॉक्टर भी पीछे नहीं हैं और अब तो बुजुर्गो के साथ-साथ युवा भी आगे आ रहे हैं।
पिछले दिनों एसएमएस मेडिकल कॉलेज में देहदान के लिए संकल्प पत्र भरने वालों में युवाओं की संख्या ज्यादा है। उनके इस कदम को मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने भी सराहा है क्योंकि इससे मेडिकल के विद्यार्थियों को मानव शरीर का अध्ययन करने में आसानी रहेगी। संकल्प पत्र भरने वालों में शहर का एक परिवार ऐसा है, जिसके प्रत्येक सदस्य ने देहदान करने का फैसला किया है।
पूरा परिवार देहदान का पक्षधर
प्यारी देवी की देह को आज परिजन करेंगे दान सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी पुखराज सकलेचा का पूरा परिवार देहदान का पक्षधर है। उनकी पत्नी रामेश्वरी देवी (66) पहले ही देहदान कर चुकी हैं। 91 वर्षीय माताजी प्यारी देवी का शुक्रवार देर रात निधन हो गया। उनके परिजन शनिवार को एसएमएस कॉलेज के एनोटॉमी विभाग को देह सौंपेंगे।
मिथक टूट रहे हैं
1988 में जहां देहदान करने वाले की संख्या एक थी, वहीं 2007 में छह हो गई। मेडिकल कॉलेज में अब तक 139 संकल्प पत्र भरे जा चुके हैं। जयपुर के एक परिवार में बेटे, बहू, पत्नी, लड़की ने देहदान करने का संकल्प लिया है। इसमें 17 साल का एक किशोर भी है। इसी तरह राजस्थान विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली 20 वर्षीय छात्रा नें देहदान करने का संकल्प पत्र भरकर युवाओं को संदेश दिया है कि वे भी देहदान के लिए आगे आएं।
पहली महिला
श्रीमती रामेश्वरी देवी की मृत्यु 13 जून 2007 को हुई थी। उनकी इच्छा पर उनकी देह सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज को दान कर दी गई। ऐसा करने वाली वे जयपुर की पहली महिला थीं।
निजी कॉलेज में पहला देहदान
सीतापुरा स्थित महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज के लिए पिछले माह आनंद किशोर माथुर ने देहदान का संकल्प पत्र भरा था। संस्था के निदेशक डॉ.एम.एल. स्वर्णकार ने बताया कि निजी क्षेत्र में आनंद किशोर माथुर की ओर से किया गया देहदान राज्य में पहला है। इससे मेडिकल छात्रों को अध्ययन में सुविधा के अलावा आम नागरिक भी प्रोत्साहित होंगे।
मेडिकल कॉलेज में देह का दान करने से मेडिकल विद्यार्थियों को मानव शरीर की जटिलताओं, व्याधियों और उनकी चिकित्सा की जानकारी आसानी से मिलती है। दान में मिली देह शोध व अध्ययन के लिए उपयुक्त होती है।
—डॉ. अशोक पानगड़िया, अधीक्षक, एसएमएस मेडिकल कॉलेज
जीने को तो सभी जीते हैं, लेकिन मृत्यु के बाद भी मानव के कल्याण के लिए अपनी देह का दान करना बिरले व्यक्तियों का ही काम है।
- दिनेश कुमार मिश्रा, ज्योतिषाचार्य
पिछले पांच साल में देह का दान करने की परंपरा बढ़ती जा रही है। देह के दान को सबसे बड़ा दान माना जाता है।
—डॉ. जगदीश चौधरी, एनोटॉमी विभागाध्यक्ष, एसएमएस मेडिकल कॉलेज