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सेरेब्रल लैब के लिए पांच करोड़

रायपुर. मानसिक रूप से विकलांग हजारों बच्चों के इलाज के लिए सरकार ने इंटीग्रेटेड लैब खोलने के लिए 5 करोड़ रुपए मंजूर कर दिए हैं। यह देश का पहला इंटीग्रेटेड सेंटर होगा। लोगों को अब बच्चों के मांसपेशियों में जकड़न और दिमागी विकलांगता के इलाज के लिए हैदराबाद-नागपुर तक नहीं जाना होगा।

यह महंगा इलाज लोगों को अपने ही प्रदेश में न्यूनतम खर्च पर मिल सकेगा। बाहर जाने पर अभी इसके इलाज पर एक बार में 20 से 50 हजार रुपए तक खर्च हो जाते हैं जो गरीबों के लिए संभव नहीं है।यहां दोनों बीमारियों का इलाज एक साथ हो सकेगा।

नया लैब माना में स्टेट रिसोर्स सेंटर के पास बनेगा या अस्थायी इंतजाम तक किराए का भवन लिया जाएगा। पंचायत एवं समाज कल्याण विभाग के डायरेक्टर पीपी सोती ने बताया कि जर्मनी, इंग्लैंड से विदेशी मशीनें खरीदनेग्लोबल या ई-टेंडर जारी किए जा रहे हैं।

टेक्नीशियन स्टाफ रखा जाएगा। इसमें बायो इंजीनियर, फिजियो थेरेपिस्ट, आकुपेशनी थेरेपिस्ट, साफ्टवेयर स्पेशलिस्ट, विजिटर आथरेपेडिक सर्जन, नर्सिग स्टाफ और प्रशासनिक अधिकारी होंगे।मशीनों के रखरखाव और संचालनालय के कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने के लिए 5-5 लाख रुपए का अलग से प्रावधान किया गया है।

पेरेंट्स को ट्रेनिंग : उन्होंने बताया कि कुछ दिनों पूर्व विभाग की ओर से पीड़ित बच्चों के पेरेंट्स को ट्रेनिंग भी दी जा चुकी है। इसके लिए तमिलनाडू और दुबई से एक्सपर्ट बुलाए गए थे। शासन विभाग के कर्मचारियों को भी ट्रेनिंग दिलवाएगा।

दस दिनी ट्रेनिंग के दौरान करीब पांच दर्जन पेरेंट्स ने ओटिजम और सेरेब्रल पालिसी से पीड़ित बच्चों को सम्हालने के टिप्स सीखे। 2.9 फीसदी बच्चे पीड़ित —अफसरों ने बताया कि इन बीमारियों से 2.9 फीसदी बच्चे पीड़ित हैं। हालांकि ओटीजम और सेरेब्रल पालसी के कितने मरीज हैं, इसके लिए सर्वे नहीं कराया गया है। फिर भी इनकी संख्या हजारों में है।

शिशुरोग विशेषज्ञ डा. राजेश कालडा का मानना है कि मानसिक विकलांगता का असर ताउम्र भी हो सकता है। इलाज का उद्देश्य यह होता है कि पीड़ित बच्च माता-पिता पर निर्भर न रहे। उसे इतना सक्षम बना दिया जाता है कि अपनी दिनचर्या के कार्य खुद कर सके। बच्चों को हास्टल की तरह अस्पताल में रखकर इसकी ट्रेनिंग दी जाती है। इसका इलाज फिजियोथेरेपिस्ट, आथरेपेडिक्स, न्यूरोलाजिस्ट आदि कई विशेषज्ञ डाक्टरों का टीम वर्क है।





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