नई दिल्ली.
मध्यप्रदेश और राजस्थान में बाल विवाह करवाने वाले ज्यादातर अभिभावक और रिश्तेदार नए कपड़ों, गाजे-बाजे और मिठाइयों का लालच देकर अपने बच्चों की शादियां करवा देते हैं।
इस तथ्य का खुलासा महिला व बाल विकास मंत्रालय के एक ताजा सर्वेक्षण में हुआ है। इसके अनुसार नाबालिग लड़के-लड़कियों को परंपराओं, गरीबी और माता-पिता व रिश्तेदारों के दबाव के कारण भी विवाह करने के लिए विवश होना पड़ता है।
मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय जनसहयोग एवं बाल विकास संस्थान के महिला विकास संभाग द्वारा किए गए इस अध्ययन के मुताबिक, कम उम्र में विवाहित होने वाले इन बच्चों को विवाह का मतलब भी नहीं मालूम है।
कहां व कैसे हुआ अध्ययन
यह सर्वेक्षण राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के दो-दो जिलों को मानक बनाकर किया गया है। इसके लिए राजस्थान के टोंक व जयपुर, मध्यप्रदेश के भोपाल व शाजापुर और उत्तरप्रदेश के वाराणसी व मेरठ के दस-दस गांव में कम उम्र में विवाह के बंधन में बंधे लोगों के माता-पिता, सास-ससुर, बड़े भाई-बहन और अन्य सगे संबंधियों से बातचीत की गई।
विवाह माने उत्सव
उत्तरप्रदेश में 66 फीसदी के लिए विवाह का मतलब उत्सव मनाना है, 41 फीसदी के लिए आकर्षण का केंद्र बनना है, तो 25 फीसदी के लिए नए कपड़े पहनना है।