भोपाल. अब तक लगभग दंत-नख हीन रहे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (एनआरईजीए) को कारगर बनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। इसके लिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने लोकपाल नियुक्त करने का प्रस्ताव तैयार किया है। देशभर के हर जिले में नियुक्त होने वाले ऐसे 614 लोकपाल और उनके दफ्तरों पर करीब साढ़े 12 अरब रुपए सालाना खर्च का अनुमान है।
सूत्रों के मुताबिक एनआरईजीए के क्रियान्वयन पर नजर रखने के लिए लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया महीनेभर में पूरी हो जाएगी। इस बीच एनआरईजीए पर काम कर रहे देशभर के जन संगठनों ने मंत्रालय के प्रस्ताव पर ढेरों सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है कि प्रस्ताव के अनेक प्रावधान रोजगार गारंटी कानून की मूल भावना के ही विपरीत हैं।
करीब तीन साल पहले लागू हुए एनआरईजीए के क्रियान्वयन को लेकर हर जिले में अनेक शिकायतें लंबित हैं, लेकिन इससे निपटने के लिए कानून में कोई कारगर प्रावधान नहीं है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पांच मुद्दों- सामाजिक अंकेक्षण, पारदर्शिता, शिकायत निवारण, योजना और लोकपाल व जबावदेही पर कानून बनाने या उसमें बदलाव करने के सुझाव देने के लिए तीन महीने पहले दो समितियों का गठन किया था। इन समितियों ने अपनी-अपनी सिफारिशें मंत्रालय को सौंप दी हैं।
प्रस्ताव के मुताबिक संबंधित जिले से बाहर के सेवानिवृत्त या मौजूदा आईएएस या उनके समकक्ष अधिकारी लोकपाल बनाए जाएंगे। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित राज्य स्तरीय समिति की सिफारिशों पर नियुक्त किए जाने वाले लोकपाल का कार्यकाल दो साल का होगा।
प्रस्ताव में कहा गया है कि लोकपाल की नियुक्ति के बाद एनआरईजीए से संबंधित किसी मामले को अदालत में नहीं ले जाया जा सकेगा। जन संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस प्रस्ताव में दर्शाया गया खर्च बेमानी है। जिले के मौजूदा प्रशासनिक ढ़ांचे के समानांतर लोकपाल की व्यवस्था की जाना चाहिए। इसमें दो या तीन लोकपाल नियुक्त कर उन्हें अदालत जैसे अधिकार दिए जाएं। इस प्रक्रिया में अदालत के दरवाजे खटखटाने पर रोक लगाना नागरिक के मूल अधिकारों का उल्लंघन होगा। इसी तरह पारदर्शिता के प्रावधान भी जरूरी हैं।