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रोजगार के हक में ग्रामीण हुए सचेत

भोपाल. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एनआरईजीएस) ने ग्रामीण रोजगार की उपलब्धता के साथ-साथ आम लोगों में चेतना का विस्तार किया है। राज्य और केंद्र की सरकारें इसके क्रियान्वयन में पैंतरेबाजी करती हैं, लेकिन इसके बावजूद पारदर्शिता, न्यूनतम मजदूरी की जानकारी और अपने हक के रोजगार को लेकर ग्रामीण सचेत हुए हैं।

ये बातें अर्थशास्त्री और राष्ट्रीय रोजगार गारंटी परिषद के सदस्य प्रो. ज्यां द्रेज ने कहीं। वे एनआरईजीएस के क्रियान्वयन में कानून के उपयोग पर टीटीटीआई सभागार में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में समापन भाषण दे रहे थे। ह्यूमेन राइट्स लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन), दिल्ली द्वारा 6-7 सितंबर, 08 को आयोजित इस सम्मेलन में 14 राज्यों से आए 50 संगठनों के करीब डेढ़ सौ प्रतिनिधियों ने भाग लिया।कानून के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए दिशानिर्देशों पर टिप्पणी करते हुए श्री द्रेज ने कहा कि इन्हें पहले तो अनिवार्य बताया गया था, लेकिन बाद में आर्थिक अनियमितताओं की पकड़ में आने पर ऐच्छिक कर दिया गया।

एनजीओ नेकडोर, दिल्ली के अशोक भारती ने कहा कि पूरे कानून को दलितों, वंचितों के नजरिए से देखने की जरूरत है। उन्होंने कानून में परिवार जैसी पेचीदा इकाइयों की परिभाषाओं की ओर भी ध्यान दिलाया। एनटीयूआई के गौतम मोदी ने कहा कि फिलहाल क्रियान्वयन करने वाली एजेंसी के हाथ में ही शिकायतों और भ्रष्टाचार के निवारण की जिम्मेदारी है। ऐसे में क्रियान्वयन को श्रम कानूनों के तहत लाया जाना चाहिए।

वक्ताओं ने बगैर ग्रामसभा की अनुमति के बायो-डीजल के नाम पर रतनजोत की खेती और राज्य सरकारों द्वारा गैरकानूनी तरीके से एनआरईजीएस के तहत उपयोजनाओं के थोपने पर भी नाराजी जताई। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में सामाजिक अंकेक्षण ठेके पर एनजीओ से करवाया जा रहा है, जो अवैध है। इसके पहले सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों ने सामाजिक अंकेक्षण, पारदर्शिता और अंबुड्समैन विषयों पर तीन समूहों ने चर्चा कर अपनी रिपोर्ट पेश की। कार्यक्रम का संचालन एचआरएलएन के कॉलिन गोन्साल्वेज ने किया।





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