Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood आशा के जन्मदिन पर विशेष प्रस्तुति.
आशा भोसले के बारे में लिखना बेहद मुश्किल काम है। मुश्किल इसलिए क्योंकि उनकी संगीत-यात्रा इतनी विराट है कि हम संशय में पड़ जाते हैं, किस पहलू का ज़िक्र करें और किसे छोड़ दें।
आशाजी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि घर में लता मंगेशकर जैसे दमकते सूरज के रहते हुए भी उन्होंने अपनी रोशनी का असर दिखाया। इसलिए हम आज आशा भोसले के कुछ कम-सुने, कुछ अन-सुने गानों की चर्चा करेंगे।
मुझे गुलज़ार की बात याद आती है, उन्होंने आशा भोसले के बारे में कहा था कि आशा नील आर्मस्टॉंग के साथी एडविन ऑल्ड्रिन की तरह हैं, लताजी ने सुरों के चंद्रमा पर क़दम पहले रखा, उसके बाद आशाजी ने भी ठीक वहीं क़दम रखे हैं।
आशा भोसले को संगीत के क़द्रदान याद करते हैं, तो झमाझम गानों के लिए। पश्चिमी शैली के उन गानों के लिए, जिनमें आशा भोसले ने वाक़ई अपनी प्रतिभा ख़ूब बिखेरी है। लेकिन आशाजी को हम उनके फिल्मी गानों तक मेहदूद रखकर नहीं देख सकते।
जब भी मौक़ा मिला है, आशा भोसले ने अलग-अलग शैलियों में अपनी आवाज़ की एक नई परिधि हमारे सामने रखी है। मुझे याद आता है कि एक अरसा पहले आशाजी ने मशहूर ग़ज़ल-गायक ग़ुलाम अली के साथ अपना ग़ैर-फिल्मी एलबम तैयार किया था—‘मेराज-ऐ-ग़ज़ल’।
हालांकि आशाजी ने इससे पहले भी ग़ज़लें और ग़ैर फिल्मी रचनाएं गाई हैं, पर इस एलबम में आशाजी की ख़ालिस प्रतिभा सामने आई। ‘फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए, फिर पत्तों की पाजेब बजी तुम याद आए’ जैसी रचना हो या फिर ‘रात जो तूने दिये बुझाए मेरे थे’, ‘सलोना-सा सजन है और मैं हूं’ जैसे गीत या ग़ज़लें। ऐसा लगा, जैसे संगीत के क़द्रदानों को एक नया तोहफ़ा मिल गया है।
इसी तरह मुझे याद आता है कि एक ज़माने में संगीतकार जयदेव ने आशा भोसले का एक ग़ैर फिल्मी एलबम तैयार किया था, जिसमें महादेवी वर्मा की एक रचना थी— ‘कैसे उनको पाऊं आली’। एक रचना थी जयशंकर प्रसाद की— ‘तुमुल कोलाहल कलह में मैं विरह की बात रे मन’।
जहां तक मुझे याद आता है, इस रिकॉर्ड में बाक़ी रचनाएं मीराबाई की थीं। आज के झमाझम संगीत वाले इस दौर के बच्चों ने तो शायद ये रचनाएं सुनी ही न हों, पर यक़ीन मानिए कि ‘दम मारो दम’ और ‘पिया तू अब तो आजा’ गाने वाली आशाजी ने जिस कुशलता के साथ इन साहित्यिक रचनाओं को निभाया है, वो अद्भुत है। इसलिए अपने पुराने लेखों की तरह यहां भी मुझे कहना पड़ेगा कि इन रचनाओं को खोजिए, ख़ुद सुनिए और अपने आसपास के लोगों को भी सुनाइए।
जब आशा भोसले के गाए साहित्यिक गीतों की बात हो, तो भला 1974 में आई ‘कादंबरी’ के गीत को कैसे भुलाया जा सकता है, जिसे अमृता प्रीतम ने लिखा था और उस्ताद विलायत ख़ां साहब ने स्वरबद्ध किया था। बोल थे— ‘अंबर की एक पाक सुराही बादल का एक जाम उठाकर घूंट चांदनी पी है हमने बात कुफ्र की..की है हमने।’
कोमल भावनाओं वाले ऐसे गानों को गाना तलवार की धार पर चलने जैसा होता है और बहुत ही ‘लाउड’ गीतों से लोकप्रियता हासिल करने वाली आशा भोसले ने इतने संयम के साथ इस गाने को गाया है कि क्या कहें।
गुलज़ार, आशा भोसले और पंचम (राहुल देव बर्मन) ने मिलकर कई प्रयोग किए और ये गाने आज भी सुनने वालों के दिलों की धड़कन हैं। इनके फिल्मी गीतों से आप सभी परिचित हैं ही। पर मैं 1987 में आए एलबम ‘दिल पड़ोसी है’ की याद दिला रहा हूं। गुलज़ार का कहना है कि यह एलबम रिश्तों के अनछुए अहसासों पर केंद्रित था और आशाजी तो इसे अब भी अपना सबसे अच्छा एलबम मानती हैं।
‘शाम से आंख में नमी सी है , आज फिर आप की कमी सी है’, ‘भीनी भीनी भोर, भोर आई’, ‘रात क्रिसमस की थी, ना तेरे बस की थी ना मेरे बस की थी’ जैसी कुल चौदह रचनाएं थीं इस एलबम में। शायद ठीक से प्रचार नहीं हुआ इसलिए एक बड़े वर्ग तक इस एलबम की ख़बर नहीं पहुंच सकी। लेकिन आपको बता दूं कि अब भी इस एलबम के री-प्रिंट उपलब्ध हैं।
खय्याम और आशा भोसले ने मिलकर 1997 में एक एलबम तैयार किया था, जिसका नाम था ‘ख़य्याम एंड आशा’। इस एलबम में ऩक्श लायलपुरी, निदा फ़ाज़ली और हसन कमाल जैसे शायरों की रचनाएं थीं। आशा भोसले ने पॉप म्यूज़िक की दुनिया में भी अपने कई एलबम जारी किए। 1997 में जारी हुआ ‘जानम समझा करो’ तो अब ‘कल्ट’ का दर्जा हासिल कर चुका है। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे ग़ैर फिल्मी गीतों से सजा एक एलबम अपने ही संगीत निर्देशन में आशा भोसले ने जारी किया था, जिसका नाम था—‘आप की आशा’। इन दोनों ही एलबमों की ख्याति ख़ूब फैली।
क्या आपका ध्यान उन गानों पर गया है, जो लता मंगेशकर और आशा भोसले ने साथ-साथ गाए हैं। वैसे तो एक अरसे से दोनों बहनें एक साथ गाती आई हैं, पर फिर भी आपको कुछ गाने याद दिला दिए जाएं।
ऐसे गानों का सरताज गाना है, गिरीश कर्नाड निर्देशित ‘उत्सव’ का वसंत देव का लिखा गीत—‘मन क्यूं बहका आधी रात को’। इस गाने को भारत की दो सबसे सुरीली गायिका बहनों ने नई ऊंचाई दी है। लेकिन इससे भी पहले दोनों ने कुछ और अनमोल गाने गाए हैं । जैसे—जब जब तुम्हें भुलाया तुम और याद आए (जहांआरा), मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली (पड़ोसन)। एक अंदाज़े के मुताबिक़ दोनों बहनों ने एक साथ तक़रीबन पचहत्तर गीत गाए हैं। लेखक विविध भारती में कार्यरत हैं.