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मन की साझेदारी

मूल मंत्र.देना क्या है? देना क्यूं भला? देना या बांटना क्या कोई गुण है? क्या देना भी कोई कला है, जो श्रम और रियाज से अर्जित की जाती है? ऐसे ढेरों प्रश्न मन में सिर उठाने लगते हैं, जब देने का, बांटने का सवाल उठ खड़ा होता है। शास्त्रों में, दुनिया की महान किताबों में इसे एक महान गुण बताया गया है।

कल-कल बहती नदी प्यासे राहगीर की प्यास बुझाती है, लेकिन स्वयं कभी अपना पानी नहीं पीती। जंगल में मस्तक ऊंचा किए खड़ा वृक्ष हर किसी को छाया देता है, फल देता है, लेकिन स्वयं कभी उनका इस्तेमाल नहीं करता। बादलों से वर्षा होती है और वह वर्षा धरती को सींचती, हरा-भरा बनाती है, लेकिन वर्षा का जल बादलों के उपयोग में नहीं आता। यह सब अपना हर गुण, हर फल दूसरों के साथ बांट लेते हैं, और इसी में आनंद महसूस करते हैं। विशाल और उदात्त हृदय वह है, जो देने में, बांटने में यकीन रखता है।

ओ. हेनरी की एक प्रसिद्ध कहानी है -‘द गिफ्ट ऑफ मैगी’। एक पति-पत्नी अपनी सबसे प्रिय चीज का बलिदान करके एक-दूसरे के लिए उपहार लेकर आते हैं। मैगी अपने लंबे, खूबसूरत बालों को बेचकर अपने पति की बहुत प्रिय घड़ी के लिए पट्टा खरीदकर लाती है और पति अपनी वही घड़ी बेच देता है, मैगी के सुंदर बालों के लिए एक कंघी खरीदने के लिए।

दोनों का उपहार एक-दूसरे के काम नहीं आता, लेकिन यह कहानी अंत में हमारे मन में प्रेम, त्याग, बलिदान और देने की ऐसी छवि छोड़ जाती है कि घंटों आंखों के सामने उनकी तस्वीर घूमती रहती है। ऐसा ही त्याग करता है प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ का छोटा बच्च हामिद, जो सारे बच्चों को मिठाई, खिलौनों के लिए ललचाते देखकर भी अपने दो आने से दादी के लिए चिमटा खरीदकर लाता है। चिमटा मामूली चीज है, लेकिन हामिद का त्याग, दादी के लिए उसका प्यार एक छोटे चिमटे को मन में हमेशा के लिए बसा देते हैं।

देना क्या है? :

अपने लिए हर इंसान चीजें खरीदता है और इकट्ठा करता है। लेकिन अपनी चीजें दूसरों के साथ बांटना, यह हर कोई नहीं कर पाता। असुरक्षा की भावना के कारण मनुष्य जीवन भर अधिकाधिक अर्जित करने में लगा रहता है।

उसे डर सताता है कि दूसरों को देने से उसके पास कम हो जाएगा। यह भय मृत्यु तक मनुष्य के साथ रहता है और देने के बजाय वह हमेशा संग्रह करने में ही लगा रहता है।

देना एक जटिल भाव है। क्या देना और किसे देना? एक इंसान के पास देने को धन, संपत्ति, विचार, भावनाएं, प्रेम बहुत कुछ हो सकता है और लोग आपस में इन चीजों का साझा करते भी हैं। अपनी भावनाएं और प्रेम एक-दूसरे के साथ बांटते हैं। सुख-दुख का साझा करते हैं।

यह एक मानवीय जरूरत है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह सबसे कटकर बिल्कुल अकेला नहीं रह सकता। साथ होने पर एक किस्म का साझा तो होता ही है। लेकिन वह क्या चीज है, जो किसी व्यक्ति को नदी और वृक्ष जैसा महान बनाती है। देना भी ऐसा, जो अपने हितों और बदले में कुछ पाने की कामना से ऊपर हो, जिसमें नि:स्वार्थता हो, त्याग हो, समर्पण और बलिदान का भाव हो।

साझा किन चीजों का :

प्रेम और भावनाएं साझा करने और भौतिक वस्तुएं साझा करने में एक फर्क होता है। भावनाओं का साझा तो व्यक्ति की अपनी आंतरिक जरूरत होती है। आप प्रेम पाना चाहते हैं और इसलिए प्रेम करते भी हैं। लेकिन अपनी वस्तुएं, धन और भौतिक जीवन से जुड़ी चीजें साझा करने के लिए कहीं ज्यादा आत्मिक शक्ति और त्याग की भावना की जरूरत होती है।

यह इतना सरल नहीं है। इस देने की भी बहुत सारी पर्ते हैं। जैसेकि यदि किसी के पास इफरात धन-संपदा है, और उसमें से थोड़ा-सा वह किसी को दे भी देता है तो यह कोई बड़ा त्याग नहीं है। एक विशाल समुद्र में से कुछ बूंदें चली भी जाएं तो समुद्र की विशालता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन अगर कोई अपने दस रुपए में से दो रुपए भी किसी जरूरतमंद को दे देता है तो यह उसकी उदात्तता और मन की विशालता को दर्शाता है।

इतिहास ऐसे उदाहरणों से पटा पड़ा है। जिनका भी जीवन अपने सीमित दायरे से उठकर पूरी मानवता के हित के काम आया, उनमें साझेदारी का, देने का यह गुण कूट-कूटकर भरा था। प्रसिद्ध चित्रकार वैन गॉग और उसके भाई सिडनी और चार्ली चैप्लिन और उसके बड़े भाई के बीच ऐसी अप्रतिम साझेदारी थी। दोनों का सबकुछ एक-दूसरे के लिए था और ऐसा था कि उसे बांटा ही नहीं जा सकता था। मैरी क्यूरी ने पढ़ाई के साथ-साथ शहर में रहकर गवर्नेस का काम किया था, अपने छोटे भाई-बहनों को पढ़ाने के लिए। अपने पास एक ढेला भी न रखकर वह सबकुछ उन्हें भेज दिया करती थी।

तोल्स्तोय के उपन्यासों में ऐसे दान और साझेदारी के ढेरों उदाहरण भरे पड़े हैं। कर्ण की दानवीरता की कहानी हमारे देश के इतिहास में यूं ही नहीं सुनाई जाती। कहानी का हर संकेत उसके इस गुण की उदात्तता की ओर होता है।

देना हो सहज :

जब हम किसी को कुछ देते हैं या अपनी चीजों का साझा करते हैं तो उसमें उतनी ही सहजता होनी चाहिए, जितनी सहजता हवा के बहने में है या फूल के खिलने में। जिस सरलता से हम सांस लेते हैं, उसी सरलता से अपनी चीजें भी दूसरों के साथ बांटें। अगर इस देने में आत्म-गौरव या आत्म-प्रशंसा का कोई भाव आता है या अपनी महानता और दूसरे की कमतरी का बोध तो देना मिट्टी बराबर हो जाता है। वृक्ष को कभी यह आत्म गौरव नहीं होता कि वह बहुत महान है, त्यागी है।

ऐसा ही हमारे साथ भी होना चाहिए। देने का मकसद किसी को छोटा दिखाना या उसे खुद से हीन साबित करना नहीं है। यह नि:स्वार्थ आदान-प्रदान तभी संभव हो पाता है, जब आपको यह बोध हो कि कुछ भी आपकी सतत संपत्ति नहीं है। सबकुछ सबका है। आपकी चीजों पर दूसरों का भी अधिकार है। अगर अपने-अपने का बोध बना रहे तो देना हमेशा कष्टप्रद होगा और आत्मश्लाघा के भाव से तो कभी भी मुक्ति नहीं मिल सकेगी।

साझेदारी में है सुख :

साझेदारी में जीवन का जो आनंद है, वह संग्रह में नहीं है। बुद्ध और ईसा मसीह से लेकर गांधी तक सभी ने उस सुख के बारे में लिखा है, जो साझेदारी से, देने से मिलता है। अपनी किताब ‘आर्ट ऑफ लविंग’ में एरिक फ्रॉम लिखते हैं कि मनुष्य को प्रेम की चरम अनुभूति तब होती है, जब वह प्रदान कर रहा होता है। देने में एक दैवी आनंद है, जो वही महसूस कर सकता है, जिसने आत्म से और बदले में कुछ भी पाने की कामना से ऊपर उठकर कभी किसी को कुछ दिया हो।

बुद्ध कहते हैं कि देने का और साझेदारी का गुण मनुष्य में जन्मजात हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन अपनी समझ, विवेक और जीवन के ज्ञान से वह इस गुण को अर्जित कर सकता है। सही और गलत का, अच्छे और बुरे का बोध हमें इस दिशा में जाने के लिए प्रेरित करता है। जैसे हम सितार बजाना सीखते हैं, वैसे ही देना भी एक कला है, जो अर्जित की जा सकती है और अर्जित की जानी चाहिए। यह कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। आप चाहें तो साझा करना सीख सकते हैं।

अपनी चीजें दूसरों के साथ बांटें। मान लीजिए कोई वस्तु आपको बहुत प्रिय है तो उसे अपने किसी प्रिय व्यक्ति को दे दीजिए। इच्छा नहीं होगी और देने में दुख भी होगा। लेकिन यह एक रियाज है। इस तरह आप अपनी प्रिय वस्तुओं को देना और उसके बगैर रहना सीखेंगे।

थोड़े समय में आप खुद अपने भीतर भारी फर्क महसूस करेंगे। उस वस्तु के उपभोग में उतना सुख नहीं था, जितना उसे किसी को देने में मिलेगा। उस वस्तु को पाकर उसकी आंखों में जो खुशी दिखेगी, वह खुशी ऐसी सौ वस्तुओं के आनंद से भी बड़ी है।

खाने की जो चीज बहुत प्रिय हो, वह भी स्वयं न खाकर किसी और को दे दें। हमेशा ही ऐसा करना जरूरी नहीं, लेकिन यह सब इस गुण को अर्जित करने की प्रक्रिया है। इसी तरह इंसान सीखता है। बच्च जब छोटा हो, तभी से उसे बांटने और देने की कला सिखाई जानी चाहिए। वह हमेशा अपना खिलौना, अपनी चॉकलेट और हर प्रिय चीज घर के सभी लोगों और मित्रों में मिल-बांटकर इस्तेमाल करे। यदि वहीं से इसके बीज पड़ जाएं तो बड़ा होते-होते यह साझा उसके स्वभाव, उसके जीवन का हिस्सा बन जाएगा।





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DALJIT SINGH WALIA
Monday, 15th Sep 2008, 17:56
fantastic