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Astro Speak Astro Speak पितृ पक्ष विशेष. इस शरीर से पूर्व हम कहां थे, माता के गर्भ में। माता के गर्भ से पूर्व हम कहां थे, पिता के पेट में। पिता के पेट से पूर्व कहां थे, पिता के वीर्य में। पिता का वीर्य कहां से बना, गेहूं से। गेहूं कहां से उत्पन्न हुआ, खेत से। ख्ेात में किन तत्वों ने उत्पन्न किया, पंचतत्वों ने। पंचतत्वों में मुख्य रहा जल।
ज्योतिष विज्ञान मानता है कि ग्यारहवें भाव में मंगल-केतु से पीड़ित हो और चतुर्थ भाव में पापयुक्त ग्रह हो तो ऐसी स्थिति में बाधा उत्पन्न होती है। जातक के घर में कंकाल, सर्प आदि उपस्थित होते हैं।
सप्तम में शनि पीड़ित हो, अष्टम भाव में या द्वितीय भाव में ग्रहण योग हो, पांचवे भाव में सूर्य-शनि हो, छठे भाव में निर्बल चंद्र, द्वादश भाव में गुरु हो, दूसरे, पांचवे, नौवें, बारहवें भाव में अगर शुक्र, बुध हो तो जातक पितृ के प्रकोप से नहीं बच पाता। ऐसे जातक बर्बाद होकर अभागा जीवन व्यतीत करने पर विवश होते हैं। सूर्य + चंद्र + राहु की युति भी यह फल बताती है। प्राय: कालसर्प दोष से पीड़ित कुंडली के लोगों पर भी पितृदोष होता है।
पितृ अपने लिए शीतलता की खोज में पृथ्वी पर आते हैं। जिनके वंश में सभी रिश्तेदार हैं, वे आशा लेकर आते हैं कि कोई तो होगा पिंडदान देने वाला। पिंड मिलने पर आशीष देकर पितृ पुन: लौटते हैं। नहीं मिलने पर रोष, निराशा का प्रकट होना स्वाभाविक है।
अमावस्या को किसी भी सगे-संबंधी, मित्र, स्नेही, सेवक तथा जिनकी मृत्यु तिथि का पता न हो, उन्हें पिंडदान दिया जाता है। पितृदोष से पीड़ित परिवारों में निम्न लक्षण पाए जाते हैं। परिवार में अनावश्यक वैचारिक मतभेद होते हैं। शरीर में दर्द और थकावट रहती है। अगर पितृ किसी बंधन में हो तो जातक के सिर में निरंतर दर्द रहता है। मांगलिक कार्य में अनावश्यक विलंब होता है। भरपूर आय के होते हुए भी बचत नहीं हो पाती है।
पितृदोष से मुक्ति हेतु श्राद्ध करें और अपने दैनिक जीवन में पूर्वजों का सम्मान बनाए रखें। श्राद्ध पक्ष में 16 दिन तक तर्पण करें। तांबे के लोटे में जल लें, श्वेत अर्क के पुष्प मिलाकर 16 दिन तक सूर्य को अध्र्य दें। पितरों के निमित्त घर में दीपक जलाएं। सवा मीटर चमकीला सफेद कपड़ा लें, इसके एक कोने में सवा रुपया (सिक्का) और चुटकी भर चावल बांधें और गांठ लगा दें। अब इस कपड़े में साबुत जटा वाले नारियल रखें और नारियल को इस कपड़े में बांधे। कपड़े सहित इस नारियल को घर में गुप्त स्थान में रखें।
पितरों को भोग लगाकर प्रसाद को घर के लोग ग्रहण करें। गोग्रास, श्वानग्रास, काकग्रास निकालें। इस तरह सभी पितरों का श्राद्ध स्वयं करें, जिससे पितृ वर्ग अनुकूल हो सके और आप दोष से मुक्ति पा सकें।
जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष नहीं है किंतु उनके जीवन में बहुत संघर्ष एवं कदम-कदम पर रुकावटों का सामना करना पड़ता हो तो वे भी इस प्रयोग से अनुकूलता प्राप्त कर सकते हैं।
यत पिन्डे तत ब्रम्हाण्डे अर्थात जो कुछ पंचतत्व इस शरीर रूप में स्थित है, वही पंचतत्व ब्रrांड में व्याप्त है। ब्रrा से उत्पन्न होकर उसी में समा जाता है। यह प्रश्न उठता है इस शरीर से पूर्व हम कहां थे, माता के गर्भ में। माता के गर्भ से पूर्व हम कहां थे, पिता के पेट में। पिता के पेट के पूर्व कहां थे, पिता के वीर्य में। पिता का वीर्य कहां से बना, गेहूं से। गेहूं कहां से उत्पन्न हुआ, खेत से। खेत में किन तत्वों ने उत्पन्न किया, पंचतत्वों ने।
पंचतत्वों में मुख्य रहा जल। जल कहां से उत्पन्न हुआ, चंद्र से। अग्नि ने पकाया। अग्नि सूर्य से उत्पन्न हुई। मिट्टी मंगल से। इस प्रकार हमारे ग्रह को उत्पन्न करने में सबसे अधिक महत्व ग्रह की रश्मियों का है। जिस भी ग्रह के तत्व की अधिकता होती है, उन्हीं ग्रहों की किरणों को लेकर हमारा जन्म होता है। उन्हीं ग्रहों की रश्मियां जीवन भर हमें प्रभावित करती हैं। यदि पितरों का आशीर्वाद हमें प्राप्त नहीं हो रहा तो इसका कारण बताने के लिए राहु - केतु मुख्य भूमिका अदा करते हैं। पितृगण हमारे पूर्वज हैं। जिनका ऋण हमारे ऊपर है, क्योंकि उन्होंने हम पर उपकार किया है।
मनुष्य लोक, पितृलोक और सूर्यलोक के पश्चात आत्मा जब इस जीर्ण-शीर्ण शरीर को त्याग कर ऊपर उठती है तो वह पितृलोक में जाती है। वहां हमारे पूर्वज मिलते हैं। कभी-कभी मोहवश कुछ परिवारों में ऐसा कहा जाता है कि इस बच्चे की आदत अपने दादा-दादी या अमुक रिश्तेदार पर गई है।
ऐसा इसीलिए कहा जाता है कि हमारे पूर्वजों का प्रभाव आने वाली संततियों पर भी पड़ता है। हमारे यही पूर्वज अपने सूक्ष्म शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग हमारे लिए न तो श्राद्ध रखते हैं और न ही प्यार या स्नेह करते हैं और न ही किसी त्योहार, विशेष आयोजन और अवसर पर हमें याद करते हैं, तब उनकी आत्माएं दुखी होती हैं और दुखी होकर हमें शाप देती हैं।
यही शाप पितृदोष कहलाता है। पितृदोष जन्म जन्मांतर तक अपनी संतानों की कुंडली में रहता है, जब तक इसकी शांति या परिहार न कराया जाए। देवता सदा आशीर्वाद देते हैं। उसी प्रकार पितृ भी सदैव आशीर्वाद देते हैं। उन्हें श्रद्धा से मनाइए, सब कार्य सफल होंगे।