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श्रद्धा से करें सो श्राद्ध

ग्रह योग pi श्राद्ध का अर्थ है, जो श्रद्धा से किया जाए। पितरों ने चूंकि हमें जन्म दिया है, अत: उनके प्रति आभार प्रदर्शन श्रद्धा से हो। यह आभार व्यक्त करना ही श्राद्ध है। श्राद्ध के लिए बहुत अधिक उपादानों की आवश्यकता नहीं होती। सिर्फ पितरों के प्रति श्रद्धा और स्नेह का भाव ही प्रमुख होता है।

इसके साथ-साथ इतना पर्याप्त है कि किसी नदी, तालाब या जलस्रोत के निकट अंजुली में जल भर लें और उसे पितरों के प्रति श्रद्धाभाव रखते हुए उन्हीं के निमित्त पुन: जल में प्रवाहित कर दें। इसे ही तर्पण कहते हैं। श्राद्ध और तर्पण में इतना ही अंतर है कि सिर्फ जल अर्पित किया जाए तो तर्पण है और जल के अलावा अन्य चीजें भी ब्राrाण को अर्पित की जाएं तो वह श्राद्ध हो जाता है।

परंपरा में मनुष्य पर चार ऋण माने गए हैं - देव ऋण, पितृ ऋण, आचार्य ऋण और मनुष्य ऋण। देव ऋण यज्ञ, पूजन से उतरता है। पितृ ऋण पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करने से उतरता है। गुरु का ऋण सद्कार्यो से उतरता है। अंतिम मनुष्य ऋण सभी के प्रति सद्भावना से मुक्त होता है। पितृपक्ष पितृऋण से मुक्ति का महापर्व है।

पितृपक्ष आश्विन मास में ही आता है, इसका भी कारण है। मान्यता है पितृ आसमान में एक पुराणकल्पित पितृलोक में निवास करते हैं। आषाढ़, श्रावण और भादो में वर्षाकाल होता है। भादो की पूर्णमासी से आश्विन की अमावस तक 16 दिन पितृपक्ष के लिए इस उद्देश्य से निर्धारित किए गए हैं कि इस दौरान वर्षा समाप्त होने से आसमान में छाए बादल छट जाते हैं और पितरों के धरती तक आने का मार्ग स्पष्ट हो जाता है।

ठीक इसी तरह पितरों के प्रति तर्पण या श्राद्ध के रूप में हमारी श्रद्धा भी उन तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इसीलिए ठीक भादो के समापन पर पितृपक्ष आता है। इसके 16 दिन प्रतिपदा से चतुर्दशी तक और अमावस के साथ पूर्णिमा की दो तिथियों को मिलाकर तय हुए हैं, क्योंकि यही वे 16 तिथियां हैं, जिनमें से किसी एक दिन पूर्वज दिवंगत होते हैं। अत: सभी 16 तिथियों का एक कालखंड निर्मित किया गया है।

पितृपक्ष का इस समय आना एक पूरी उत्सव श्रंखला से भी संबद्ध है। उत्सवधर्मी भारतीय हर दिन उत्सव में जीते हैं। आषाढ़ पूर्णमासी को गुरुपूजन के साथ यह श्रंखला शुरू होती है। भाद्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणोश पूजन के साथ हम गुरु और गणोश को पूज चुके होते हैं। तब नवरात्र, दीपावली और होली के पहले पितृपक्ष आता है। यह समझाने के लिए कि उत्सव के दिन आए हैं और गुरु और गणोश के बाद सबसे पहले अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करें।

दशहरा और राखी एक दिन, होली कुछ दिन, दीपावली पांच दिन और नवरात्र नौ दिन के ही होते हैं लेकिन एकमात्र पितृपक्ष है, जो पूरे सोलह दिनों तक चलने वाला पर्व है। इस कालखंड को दिवंगत आत्माओं के सम्मान में केंद्रित या रूढ़ किए जाने के कारण इनकी उत्सवधर्मिता पर सूतक या अमंगल की भ्रांति जुड़ गई है। कदाचित इसी कारण लोग पितृपक्ष में मंगल कार्यो और नूतन वस्तुओं की खरीदी से बचते हैं। इन 16 दिनों को महालय की संज्ञा दी गई है। मह का अर्थ है - उत्सव और आलय का अर्थ है - घर। आशय है उत्सव का घर या घर में उत्सव। स्पष्ट है श्राद्ध पक्ष में पूरा घर उत्सव में डूब जाता है क्योंकि इन्हीं दिनों में पितृ आते हैं।

यही कारण है कि उत्सव के निमित्त नित्य खीर-पूड़ी और अन्य व्यंजन बनाए जाते हैं। चूंकि पितृ देवतुल्य हैं और वे स्वयं पधारते हैं इसीलिए उनका उत्सव देवताओं के पधारने के उत्सव जैसा ही गरिमामय और वैभवपूर्ण होता है। शास्त्रों में श्राद्ध के अनंत प्रकारों का उल्लेख है, जिनमें एक हिरण्य श्राद्ध है और दूसरा अरण्य श्राद्ध।

जिसके पास हिरण्य अर्थात सोना अर्थात बहुत धन-संपदा है वह बहुत कुछ दान कर अपने पितरों को संतुष्ट करता है। लेकिन शास्त्र कहते हैं कि जो निपट अंकिचन हो, वह भी श्राद्ध कर सकता है। उसके लिए अरण्य श्राद्ध का विधान है, जिसमें कुछ भी न हो, जल तक न हो तो भी अरण्य अर्थात जहां रण अर्थात युद्ध न हो, यानि शांति हो, उस क्षेत्र में जाकर दोनों हाथ आसमान की ओर कर मन में इतना भर कह लें कि - हे पितरो, मेरे पास कुछ नहीं है, पर अपनी श्रद्धा अर्पित करता हूं, तो भी पितृ आशीर्वाद की कृपा बरसा देते हैं।

पितृपक्ष कृतज्ञता का भाव रखने और सिखाने का पर्व है। यह केवल पितरों तक सीमित रहे तो ठीक है, लेकिन यह पितरों के आगे पूरे समाज और प्राणि मात्र तक विस्तृत हो जाए तो महान है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि हम विनम्र बनें, श्रद्धावान बनें। यह उत्सव के दिन है, इनसे ऊर्जा लें और इसी ऊर्जा, पितरों के इसी आशीर्वाद से पूरे वर्ष सुख और शांति से रहें। तभी पितृपक्ष का फल सार्थक होता है।





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