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सुख और शांति का पितृपक्ष

पितृ पक्ष विशेष. paksha कृष्ण की कृपा से पांडवों ने महाभारत का युद्ध तो जीत लिया था पर युधिष्ठिर बहुत व्यथित थे। उन्होंने शरशैया पर लेटे पितामह के श्रीचरणों में प्रणाम कर अपनी व्यथा बताई और प्रश्न किया कि हम पांडवों को सत्य और नीति पर चलकर भी वनवास, अज्ञातवास और युद्ध झेलना पड़ा, जबकि दुर्योधन ने अनीति पर चलकर भी आजीवन राजपाट का सुख भोगा। संसार में ऐसा क्यों होता है? भीष्म पितामह का उत्तर ध्यान देने योग्य है : धर्मराज! जीवन के पापों का फल इस जन्म में मिलता दिखाई न दे तो वह अगले जन्म में मिलेगा। इतना ही नहीं, उसके पुत्र-पौत्रों को भी उसका फल भोगना पड़ता है।

पूर्वजों के किए पापकर्म और उनके शाप को सामान्य भाषा में पितृदोष कहा जाता है। ऐसा नहीं है कि इस जन्म में अच्छे कार्यो, सेवा और परोपकार में लगे व्यक्तियों को कष्ट केवल पूर्वजों के पापकर्म या उनके शाप के कारण ही होता है। अपने पिछले जन्मों के पापकर्म के कारण भी व्यक्ति इस जन्म में लाख सत्कर्मो के बावजूद कष्ट में रह सकता है। उपनिषदों, पुराणों तथा स्मृतियों में कर्मफल का भोग अनिवार्य माना गया है - अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मफल शुभाशुभम्। मनुष्य के पिछले जन्म-जन्मांतर के जिन भी अच्छे-बुरे कर्मो का फल उसे नहीं प्राप्त हुआ है, वे संचित कर्म कहे जाते हैं। जिन कर्मो का फल भोगना इसी जन्म में सुनिश्चित हो गया, वे प्रारब्ध कहलाते हैं। इस जन्म में प्राप्त आयु और भोग प्रारब्ध से तय होता है।

जन्मपत्रिका में नवम, पंचम स्थान पूर्व पुण्य के तथा छठे, आठवें और बारहवें स्थान पूर्व पापकर्म के माने गए हैं। शनि ग्रह पूर्वकर्मो के फल देने वाला प्रमुख ग्रह है। सूर्य से पिता के पूर्वकर्म, चंद्रमा से माता के, राहु से परिवार के, शुक्र से पत्नी के, गुरु से संतान के, बुध से संगति के पूर्वजन्मकृत कर्मो का संकेत मिलता है।

यदि सूर्य शनि या राहु के साथ है या शनि की सूर्य पर दृष्टि है या सूर्य कमजोर है तो जिस स्थान पर ऐसा सूर्य है, वहां से नियंत्रित बातों में कष्ट होगा। जैसे यदि पीड़ित सूर्य संतान भाव में है तो पिता या पितापक्ष के पूर्वज दादा, परदादा आदि के कर्म या उनके शाप से व्यक्ति को संतान से संबंधित कोई कष्ट हो सकता है। यदि वह सूर्य कर्मस्थान पर है तो व्यापार, नौकरी में परेशानी आ सकती है। इसी प्रकार चंद्रमा शनि या राहु से पीड़ित होने पर माता या नानी, परनानी के कर्म के फल भुगतना पड़ सकता है।

कर्मफल तो भोगना ही पड़ता है, इसको प्रायश्चित से अवश्य कुछ कम किया जा सकता है। परंतु प्रायश्चित न तो कोई करता है और न कोई बताता है। पूर्वजों के निमित्त पहले प्रत्येक शुभ कार्य में नान्दी श्राद्ध किया जाता था। श्रीराम के जन्म समय नान्दी श्राद्ध का उल्लेख है, पर अब श्राद्ध शब्द से लोग डर से जाते हैं। अतएव सभी शुभ कार्य जन्म, विवाह आदि में पुरोहित औपचारिकता मात्र करते हैं। वैसे नान्दी श्राद्ध करना भी एक सरल उपाय है।

खर्चीले उपाय जो पितृदोष शांति के नाम पर किए जा रहे हैं, वे व्यापार बन गए हैं। अतएव पितृदोष शांति का सबसे असरकारी सरल और स्वयं करने योग्य उपाय यदि कोई है तो दोनों पितृपक्षों में पितरों को सोलहों दिन विधिपूर्वक तर्पण ही है।

तर्पण उपरांत दोपहर के बाद पितरों के लिए निर्धारित काल में योग्य, त्यागी, ब्रम्हनिष्ठ ब्राम्हण को भोजन के अलावा कौआ, कुत्ता, गाय और चींटी इन पांचों जीवों को भी श्राद्ध अन्न नित्य देना चाहिए। ऐसा करने से सभी ज्ञात, अज्ञात पितरों को प्रसन्नता प्राप्त होती है। पितृपक्ष में श्राद्ध से व्यक्ति मातृ, पितृ कुल के पितरों के अलावा देवताओं, यम-चित्रगुप्त, ऋषि, दिव्य पितृ, दिव्य मनुष्य तथा दिवंगत पत्नी, मित्र, मामा, बहन, चाचा, ताऊ, भाई, गुरु आदि का भी तर्पण कर सकता है। इससे सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का तर्पण हो जाने से विभिन्न अन्य संबंधीजनों के पूर्वजों की प्रसन्नता भी प्राप्त होती है।

तर्पण की यह विधि अत्यंत सरल है। पितृपक्ष में श्राद्ध तिथि का निर्णय सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि से नहीं होता। चूंकि पितरों का समय मध्याह्न् के बाद दोपहर का होता है इसलिए पूर्वक की श्राद्ध की तिथि जिस दिन दोपहर बाद हो, उसी दिन श्राद्ध करना चाहिए। तर्पण नित्य प्रात: कुशा से करना चाहिए। दोनों पितृपक्षों आश्विन व चैत्र में नियमित श्राद्ध करें। इससे पितरों की आत्मा को सुख एवं संतोष मिलेगा और पितृदोष का शमन भी अवश्य होगा।
(लेखक ज्योतिर्विज्ञान अध्ययनशाला, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर में अतिथि प्राध्यापक हैं।)





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