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असुरक्षित हैं ‘महिलाएं’

शिवपुरी. भले ही शासन ने महिला हिंसा रोकने के लिए कड़े कानून बना दिए हैं, पर आज भी जिले में महिलाएं असुरक्षित हैं। महिलाओं पर हिंसा न केवल घर के बाहर हो रही है, बल्कि घर की चाहरदीवारी के भीतर भी उन पर जुल्म किए जा रहे हैं।

इसके प्रत्यक्ष प्रमाण गुजरे तीन वर्षो में जिले के विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज किए गए वे मामले हैं, जो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि महिलाओं पर जुल्म कम होने की बजाय बढ़ रहा है।

वर्ष 2006, 2007 और वर्ष 2008 में जिले में महिलाओं पर हुए अत्याचार के आंकड़े चिंताजनक हैं। न केवल घर के बाहर महिलाएं बलात्कार, अपहरण, छेड़खानी और हमलों का शिकार हो रही हैं, बल्कि घर के अंदर दहेज प्रताड़ना, आत्महत्या के लिए प्रेरित करने और पारिवारिक कलह के कारण मारपीट की घटनाएं भी जिले में बढ़ रही हैं।

वर्ष 06 में जहां 11 महिलाओं की हत्या हुईं, वहीं 07 में यह आंकड़ा 9 और फिर इस साल यह आंकड़ा बढ़कर 13 हो गया। इसी प्रकार हत्या के प्रयास के मामले गुजरे आठ माह में 11 दर्ज हुए हैं, जबकि गुजरे साल पूरे वर्ष में ये घटनाएं 11 हुईं थीं।

पुलिस शिकायत आने पर इन मामलों में कार्रवाई करती है, पर इन घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने की दिशा में एक भी संगठन काम नहीं कर रहा है। नतीजा है कि महिलाएं हर तीसरे दिन हिंसा का शिकार होती हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि हिंसा का शिकार महिलाओं के साथ मजबूती से खड़ा होने वाला एक भी महिला संगठन जिले में सक्रिय नहीं है।

ऐसा नहीं है कि महिला संस्थाओं की जिले में कमी है, पर इन संस्थाओं व गैर शासकीय निकायों को महिला हितों की चिंता करने की बजाय शासकीय योजनाओं जैसे विवाह कराना, स्व -सहायता समूह बनाकर पौधरोपण, दलिया अथवा मध्याह्न् भोजन वितरण, भोजन का अधिकार दिलाने आदि के कार्य अधिक जंचते हैं, यही वजह है कि उत्पीड़न का शिकार महिलाओं की लड़ाई नहीं लड़ी जा रही है।

ले देकर शोषित महिलाओं को महिला आयोग की शरण में जाना पड़ रहा है, पर वहां से भी न्याय मिलेगा, इसकी गारंटी नहीं है। जिले में महिला संगठन चलाने वाली संगनी की उमा चतुर्वेदी कहती हैं- महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन उनके साथ होने वाली घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए शासन और समाज स्तर पर कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं, यह भी सही है और इसके लिए सबसे पहले महिलाओं को ही आगे आना होगा।

सिर्फ रोटियां सेंक रहे संगठन
मप्र मानव अधिकार आयोग के मित्र आलोक एम इंदौरिया कहते हैं-जिले में एक भी ऐसा संगठन नहीं है, जो महिलाओं पर होने वाले जुल्म के खिलाफ आवाज उठा रहा है। जिले में महिला संगठनों की कमी है, लेकिन ये संगठन महिला हितों की आड़ में अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। ऐसे संगठनों को महिला हिंसा को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। हालांकि मानव अधिकार आयोग अपने स्तर पर शिकायत मिलने पर पर्याप्त कार्यवाही करता है, पर बगैर सामाजिक संस्थाओं के ये कार्यवाही पूर्ण नहीं हो सकती है।

क्या पुलिस मुस्तैद है
जिले के एसपी डीसी शर्मा कहते हैं-महिलाओं पर घर के भीतर अथवा बाहर, कहीं भी हिंसा की घटना होने पर पुलिस मामला दर्ज करती है। साथ ही आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें सजा दिलवाती है। यह बात सही है कि महिला संगठन जिले में कार्य नहीं कर रहे हैं, लेकिन पुलिस अपने स्तर पर हर कार्रवाई कर रही है। ये और बात है कि कोई महिला पीड़ित होने के बाद भी पुलिस से शिकायत न करे, ऐसी स्थिति में उसके परिजनों अथवा समाजसेवी संस्थाओं को आगे आना चाहिए।

गोष्ठी और परिचर्चा तक सीमित
जिले में कार्यरत कुछ संस्थाएं महिला हितों की बात तो करती हैं, लेकिन इन संस्थाओं का कार्य महज गोष्ठी अथवा परिचर्चा तक सीमित है। आश्चर्य की बात यह है कि बलात्कार, छेड़खानी अथवा हिंसा का शिकार एक भी पीड़िता के पास ये संगठन दिलासा देने तक के लिए नहीं जाते हैं।

एक नजर में महिला हिंसा के आंकड़े

प्रकरण -------- 2006 - 2007 --- 2008 हत्या ----------- 11----- 09 ----- 13
हत्या के प्रयास ----- 07 ---- 11 ----- 11
मारपीट ----------- 63 --- 92 ----- 66
छेड़छाड़ ----------- 151 -- 152 ---- 89
अपहरण ----------- 17 --- 17 ----- 16
बलात्कार ---------- 81 --- 91 ----- 46
आत्महत्या को मजबूर करना - 14 - 17 --- 15
दहेज हत्या --------- 12 --- 23 ----- 14
प्रताड़ना ----------- 45 --- 36 ----- 46
गालीगलौज --------- 103 -- 188 ---- 67
नोट: वर्ष 2008 के आंकड़े 31 अगस्त तक के हैं।





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