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Other Sports Other Sports नई दिल्ली.
कहने को तो भारत में टेनिस की लोकप्रियता बढ़ी है। सानिया मिर्जा के उदय से इसने महिलाओं के बीच भी अपनी जगह बनाई है। लेकिन हकीकत यह है कि पिछले एक दशक से ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट या डेविस कप में लिएंडर पेस और महेश भूपति ही भारत के प्रमुख झंडाबरदार रहे हैं। देश को आज भी पेस-भूपति के ‘वारिस’ का इंतजार है, जो इनके संन्यास के बाद भारतीय टेनिस में पैदा होने वाले शून्य को भर सके।
पेस पिछले १८ वर्षो से डेविस कप में भारतीय उम्मीदों का भार संभाल रहे हैं। भूपति भी एक दशक से अधिक समय से इस टीम के सदस्य हैं। हाल ही में डेविस कप विश्व ग्रुप प्ले ऑफ मुकाबले में भारत की रोमानिया के हाथों हार ने इसकी एक और बानगी पेश की। इस मुकाबले में भार को एकमात्र जीत डबल्स मैच में पेस-भूपति ने दिलाई, जबकि सिंगल्स मैचों में प्रकाश अमृतराज और सोमदेव देववर्मन अपने दोनों एकल मैच हार गए।
डेविस कप टीम में ‘बगावत’ :
विडंबना यह है कि भारत के युवा खिलाड़ी पेस के खिलाफ विद्रोह करने को तो तैयार रहते हैं, लेकिन कोर्ट पर वे पेस के आसपास भी नहीं ठहरते। इस वर्ष भारत डेविस कप के एशिया ओसेनिया जोन ग्रुप एक में उज्बेकिस्तान और जापान को विश्व ग्रुप प्लेऑफ में पहुंचा।
लेकिन उज्बेकिस्तान के खिलाफ भारतीय टीम में कप्तान पेस और अन्य सदस्यों भूपति, प्रकाश तथा रोहन बोपन्ना के बीच मतभेद उभर आए। जिसका निपटारा अगस्त में पेस द्वारा टीम की कप्तानी छोड़ने से हुआ।
जिम्मेदारी उठाने में नाकाम युवा खिलाड़ी :-
टीम में ‘बगावत’ के घटनाक्रम को देखा जाए तो अन्य भारतीय खिलाड़ियों के ऊपर यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने प्रदर्शन से साबित करें कि उनमें प्रतिष्ठित डेविस कप में तिरंगा बुलंद करने का दमखम है। पिछले कई वर्षो में भारत ने सिंगल्स मुकाबलों के लिए कई खिलाड़ियों को आजमाया लेकिन कोई भी टीम में अपनी स्थायी जगह नहीं बना सका।
जलाए हैं ‘उम्मीद का दिया’ :-
यह तय है कि आगामी दो-तीन वर्र्षो में पेस और भूपति बढ़ती उम्र के चलते डेविस कप टीम से हट सकते हैं या संन्यास ले सकते हैं। इनकी अनुपस्थिति में भारतीय डेविस कप टीम की सूरत अधूरी सी दिखती है।
खेल मंत्रालय ने २क्१क् राष्ट्रमंडल खेलों के मद्देनजर 40 टेनिस खिलाड़ियों की पहचान की है, जिनमें से 20 पुरुष खिलाड़ी हैं। भारतीय टेनिस प्रेमी इन्हीं खिलाड़ियों को देख-देखकर ‘उम्मीद का दिया’ जलाए हुए हैं।